May 20, 2026
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राजस्थान में कांग्रेस व भाजपा चुनाव नजदीक होने के बाद भी आपसी कलह से उबर नहीं पा रही है, वहीं कर्नाटक में भाजपा को उसके अपनों ने ही संकट में डाल दिया है। जबकि दोनों पार्टियों का आलाकमान राजस्थान व कर्नाटक में कलह दूर करने के लिए नित नये जतन कर रहा है मगर उससे भी मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है।
पहले बात राजस्थान में कांग्रेस की। पहले तो गहलोत समर्थक विधायकों ने आलाकमान के पर्यवेक्षकों की बुलाई बैठक में न जाकर समानांतर बैठक आयोजित की। इस्तीफे देकर आलाकमान पर दबाव बनाया। जिसे पहले तो आलाकमान ने अनुशासन हीनता कहा मगर 6 महीने बाद भी किसी पर कार्यवाही नहीं की। उसके बाद सचिन पायलट ने अपनी सरकार होते हुए भी पिछले भाजपा राज के भ्र्ष्टाचार की जांच के लिए एक दिन का सत्याग्रह किया। इसे भी आलाकमान के पर्यवेक्षक ने अनुशासन हीनता कहा। मगर इस बार भी कोई कार्यवाही नहीं हुई।
आलाकमान ने विवाद हल करने के लिए विधायकों से वन टू वन बात करने की शुरुआत की। मगर इस बात में सीएम गहलोत व प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा भी उपस्थित हैं। जिससे ये संकेत मिलता है कि पार्टी ने अगले चुनाव के लिए गहलोत के नेतृत्त्व पर मुहर लगा दी है। इससे नाराज पायलट समर्थक विधायकों ने बातचीत में पर्यवेक्षक रंधावा को अपने तेवर भी दिखा दिये। अवसर दिया पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा ने। जब हरीश मीणा मिलने पहुंचे तो डोटासरा ने व्यंग्य किया और कहा कि ये मानेसर भी गये थे। मीणा भड़क गये। बाद में रंधावा ने उनसे अकेले में बात की। पायलट तो अपने जिले का नम्बर होते हुए भी नहीं पहुंचे, उनका पहले से ही शाहपुरा व झुंझनु का कार्यक्रम घोषित भी था।
मगर मीणा के प्रसंग का असर पायलट की सभाओं में देखा गया। उन्होंने अपने भाषण में कह दिया कि वे विरोध नहीं करते हैं मगर करते हैं तब धुंआ निकाल देते हैं। उनके समर्थक मंत्री राजेन्द्र सिंह गुड़ा ने तो आलाकमान को ही चेतावनी दे डाली कि पायलट के खिलाफ अनुशासन की कार्यवाही की गई तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे। हरीश मीणा के विवाद की ये बड़ी परिणीति थी। इससे लगता है कि बातचीत से कलह मिटाने का जतन भी कांग्रेस में कारगर नहीं होगा। प्रतिक्रिया में गहलोत समर्थक विधायकों ने भी कह दिया कि चौथी बार गहलोत ही सीएम बनेंगे। कुछ विधायकों ने जरूर दोनों में सुलह का सुझाव दिया। मगर बातचीत गुटबाजी कम करने के बजाय बढ़ाने वाली ज्यादा साबित हो रही है। जो चुनाव देखते हुए कांग्रेस के लिए सही नहीं मानी जा सकती।
भाजपा में भी सब कुछ ठीक नहीं है। सी पी जोशी को प्रदेशाध्यक्ष, राठौड़ को नेता प्रतिपक्ष, पूनिया को उप नेता बनाने के बाद भी अंदरखाने नेताओं की दूरियां बरकरार दिखती है। क्यूंकि अभी तक वसुंधरा राजे की भूमिका स्पष्ट नहीं हुई है, जिससे नेताओं की दूरियां बढ़ रही है। राजे अपने व्यक्तिगत दौरों से एक हलचल बनाये है। उनकी बड़ी फॉलोविंग है, इसे कोई नकार नहीं सकता। यदि भाजपा आलाकमान ने उनकी भूमिका जल्दी स्पष्ट नहीं की तो दूरियां ज्यादा होगी, जिसे पाटना आसान नहीं होगा और ये बात चुनाव की दृष्टि से भाजपा के लिए ठीक तो नहीं रहेगी।
अब बात कर्नाटक की। कर्नाटक भाजपा में तो जबरदस्त खलबली मची है। पूर्व सीएम, डिप्टी सीएम, विधायक आदि पार्टी छोड़ कांग्रेस में जा रहे हैं। खासकर लिंगायत नेताओं का कांग्रेस में जाना भाजपा के लिए चिंता की बात है। भाजपा में तो टिकट वितरण के बाद ज्यादा ही पलायन हो रहा है। आलाकमान इस पलायन को थामने में नाकाम साबित हो रहा है। जिसका असर चुनाव पर भी पड़ेगा, ये तय सा है। कर्नाटक के परिणाम 13 मई को आयेंगे, उसके आधार पर ही भाजपा राजस्थान में निर्णय लेगी। उस परिणाम का असर यहां होगा, ये निश्चित है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार