






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 23 अप्रेल 2023। राजस्थान में इस साल के अंत में चुनाव है और उसके लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों मैदान में उतर चुकी है, मगर दोनों के सामने अपनों की ही चुनोती बड़ी बनी हुई है। दोनों दलों के लिए अपने ही यक्ष प्रश्न बने हुए हैं और उसका हल निकल ही नहीं रहा। एक सवाल हल होता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है, हर दिन राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आते हैं और एक नया सवाल दोनों पार्टियों के लिए खड़ा हो जाता है।
पहले बात कांग्रेस की। कांग्रेस तीन तीन पर्यवेक्षक लगाने के बाद भी सीएम अशोक गहलोत व सचिन पायलट की टकराहट खत्म नहीं कर सकी है। बात बनने के बजाय हर दिन ज्यादा ही उलझती जा रही है। सचिन जो अब तक मौन को हथियार बनाकर धैर्य दिखा रहे थे, वे भी अब मुखर हो गये। धैर्य टूट गया है। पहले अविनाश पांडे को आलाकमान ने पायलट गुट के आरोपों के कारण हटाया गया। पायलट गुट का कहना था कि उन्होंने सीएम चुनते समय सोनिया गांधी को विधायकों की सही राय नहीं बताई। अजय माकन को ये जिम्मेवारी दी गई।
माकन के समय विधायक दल की बैठक बुलाई गई तो फिर टकराहट सामने आई। गहलोत गुट के विधायक आलाकमान पर्यवेक्षकों की बुलाई बैठक में नहीं गये और समानांतर बैठक बुलाई। गहलोत को बदला तो इस्तीफे देंगे, इस चेतावनी के साथ कईयों ने विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे सौंप दिए। पर्यवेक्षकों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी शामिल थे। उस अनुशासनहीनता पर गहलोत के दो मंत्रियों को नोटिस देकर पायलट को शांत किया गया। मगर गहलोत समर्थकों ने पायलट गुट के मानेसर जाने का मसला उठा लिया। उन नोटिस पर आज तक निर्णय नहीं हुआ और गहलोत का वर्चस्व बना रहा। उस टकराहट में माकन को जाना पड़ा। बाजवा पर्यवेक्षक बने।
तब सचिन ने अपनी ही सरकार के खिलाफ सत्याग्रह किया। इसे भी बाजवा ने अनुशासनहीनता करार दिया। तीखे बयान दिए। पायलट गुट ने मंत्रियों पर अनुशासनहीनता पर कार्यवाही न करने की बात उठायी और सचिन का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सचिन मुखर हो गये। विधायकों से वन टू वन बात में नहीं गये। न कार्यशाला में गये। अपितु जन सभाएं करके अपनी सरकार को ही घेरे में लेते रहे। बाजवा कुछ नहीं कर पा रहे। वहीं इशारों में ये भी बता दिया गया कि कांग्रेस की कमान चुनाव में गहलोत के पास ही रहेगी। अब दोनों नेताओं की टकराहट चरम पर है। लगता है सचिन व उसके साथी कोई भी बड़ा राजनीतिक निर्णय ले सकते हैं। आलाकमान चुप है या यूं कहें कि कुछ नहीं कर पा रहा है। जो होगा उसे झेलने का ही विकल्प ही उसके पास शेष है। अब समय तय करेगा कि इस यक्ष प्रश्न का क्या उत्तर होगा।
भाजपा की भी स्थिति अच्छी नहीं। ताकतवर आलाकमान होते हुए भी आपसी टकराहट को रोका नहीं जा सका है। आलाकमान ने बहुत पहले कह दिया कि चुनाव पीएम फेस पर लड़ा जायेगा। नेताओं को कहा गया कि वे व्यक्तिगत प्रदर्शन बंद करे। मगर उसका असर अभी तक तो दिख नहीं रहा। वसुंधरा राजे व उनके समर्थक अपने स्तर पर पब्लिक में जा रहे हैं। राजेन्द्र राठौड़ के अपने आयोजन हो रहे हैं। बाकी इच्छाधारी नेता अपने अपने तरीके से शक्ति दिखा रहे हैं। साफ साफ दिखता है कि अलग अलग हैं सब। सी पी जोशी के सामने भाजपा अध्यक्ष के नाते ये ही बड़ी समस्या है।
दोनों मुख्य दलों की इस स्थिति के मध्य आप और हनुमान बेनीवाल के साथ ओवैसी भी जमीन तलाशने आ गये है। इसलिए राजस्थान के चुनाव अजीब स्थिति में पहुंच गये हैं। लगता है चुनाव आते आते कई नये समीकरण सामने आयेंगे और उससे ही चुनाव की दिशा तय होगी। तभी तो लोग अभी कुछ कहने से बच रहे हैं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



