






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 19 अप्रैल 2021। श्रीडूंगरगढ़ में दूसरी लहर ने कहर ढाया है और 70 के पार कोरोना संक्रमित आज एक ही दिन में सामने आए। एकबारगी पूरे जिले में हड़कम्प सा मच गया। ऐसे माहौल में श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स ने संक्रमितों का हौसला बढ़ाने और उन्हें कोरोना जंग जीत लेने की प्रेरणा देने के लिए इस प्रसंग का प्रकाशन आवश्यक समझा।
कोरोना विजय गाथा: मौत से लड़ने का अपना सुख है-मधु आचार्य।
इन दिनों देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर की गिरफ्त में हैं। इस मुश्किल वक्त में तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर हमने इस बीमारी को बार-बार हराया है। लाॅयन एक्सप्रेस ऐसी ही कुछ विजय गाथाएं लाया है खास अपने पाठकों के लिए। जिसकी पहली कड़ी में हम सुनते हैं वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, रंगकर्मी, साहित्य अकादमी के राजस्थान भाषा परामर्श मंडल के संयोजक मधु आचार्य ‘आशावादी’ से उनकी कोरोना विजय गाथा।
जिंदगी से लड़ने की हरेक आदमी की अपनी एक कहानी है। बेमिसाल कहानी होती है ये। चाहे वो अमीर हो या गरीब। चाहे नेता हो या जनता। चाहे खास आदमी हो या आम आदमी। इस तरह की कहानी आदमी खुद लिखता भी है और दूसरों की लिखी पढ़ता भी है। मगर कोविड-19 ने नई कहानी लिखने का अवसर दिया। नई हो भी क्यों न, ये उत्तर आधुनिकता का काल जो है।
इस काल में कुछ भी निर्धारित नहीं, फिर इस काल की बीमारी में कैसे निर्धारित होता। मुझे भी मौत से संघर्ष की इस कहानी को शिद्दत से लिखने का पूरा अवसर मिला।
पता ही नहीं चला कब कोविड आया। कब चला गया। पर जाते जाते लंग्स को डंक लगा गया। शरीर का बाहरी हिस्सा होता तो खुली आंख से दिख जाता। भीतर की आंखे होने और उनसे देखने का शास्त्र तो भारतवासी मेरी तरह कब का भूल चूके। अब भीतर मशीनें ही देख पाती है। मैं तो लापरवाह था, ये सोचकर कि मुझे तो जिंदगी की कहानी ही लिखनी है। मगर दुनिया को शायद मुझे मौत से लड़ते देखना था।
लंग्स के डंक के बाहरी लक्षण से मानस पुत्र धीरेन्द्र अनजान नहीं था। उसे और सोम प्रकाश को अंदाजा हो गया। फिर क्या था, मेरी ना भी नहीं स्वीकारी गई। बचपन के दोस्त डॉ.तनवीर ने धावा बोल दिया। कोविड की जांच के साथ अन्य जांचें हुई। मैने तो ये सोचा, जो होगा वो ठीक। अपनों की इच्छा के सामने आत्म समर्पण करना बेहतर है। पुत्र युग, पत्नी, चेतना, भतीजे अभिषेक का भी दबाव था। तो मेरे प्रिय हरीश, भंवर पुरोहित, मां समान भाभी विजय लक्ष्मी की अपनी चिंताएं थी। मैने भी सोचा, इनकी खुशी के लिए ये जो इलाज कराएं, चुपचाप करा लेना चाहिए। इन सबके चेहरे की चिंताएं अहसास कराने लगी कि शायद बीमार ही हूं। बेटियों के समान पुत्र वधुएं मीनू, रिंकी, सोनू के उदास चेहरों ने मुझे मेरी जड़ धारणा को तोड़ा। मैने भी महसूस किया कि कोविड का मरीज हूं।
हां, इतने अपनों की मेहनत देख भरोसा था कि ठीक हो जाऊंगा। सोचता था, ये भरोसा नहीं रहा तो मौत से कैसे लड़ पाऊंगा। भीतर डर घुस गया पर आदत के अनुसार बाहर कठोर दिखाता रहा खुद को।
डॉ परमेन्द्र सिरोही, तनवीर मालावत, बी के गुप्ता, सलीम मोहम्मद आदि की निगाहें थी। मुझे पता ही नहीं चला कि इलाज के लिए पहली बार एम्बुलेंस में जयपुर तक की यात्रा करनी होगी। सुबह जाना था और मुझे आधी रात को बताया। तब तक मैं खुद को इन अपनों के हवाले कर चुका था।
हां, हमारी कर्मवादी भारतीय संस्कृति को भी पहली बार निकट से देखा। ज्योतिषी हरिनारायण व्यास ‘ मनासा’ अपने तरीके से उपचार करने में लगे थे तो वास्तुविद आर के सुतार अपनी गणित में लगे थे। मन कुछ बोलने का हुआ मगर खुद पर काबू किया।
बाद में पता चला कि डॉ परमेन्द्र सिरोही और डॉ मनासा के कहने पर इस शरीर के अधिकृत मालिक युग, धीरेन्द्र और अभिषेक ने मुझे जयपुर शिफ्ट करने का निर्णय लिया था।
जयपुर के लिए रवाना हुए रुके पीबीएम
बीकानेर से रवाना होने के लिए तनवीर की अस्पताल से अल सुबह निकले। पर एम्बुलेंस रुकी पीबीएम अस्पताल। आश्चर्य हुआ, पर कारण नहीं पूछा। अब वहां के वार्ड में। आत्म बल पूरा था, क्योंकि सामने धीरेंद्र, अभिषेक, हरीश, युग खड़े थे। पता चला ऑक्सीजन लेवल कम हो गया, अफरातफरी में लाये हैं। 7 घंटे वहां रहा। खुद ठीक महसूस कर रहा था तो साथ वाले भी खुश थे। एम्बुलेंस में था। विदा करने वालों में आर के सुतार, हरीश, सोम, डॉ. नरेंद्र डारा और भी कुछ लोग थे। युग को कार लेकर पहुंचना था। उसके चेहरे पर गाम्भीर्य था। पुत्र का पिता से इतना मोह होता है, ये देखकर खुशी हुई। हौसला बढ़ गया। अब युग, धीरेन्द्र, अभिषेक तीन थे। चौथे खाने में परिवार जिसमें मेरी कमाई के लोग थे। मुझे जबरदस्त ऊर्जा मिली। पहली बार अहसास हुआ कि ये बीमारी मुझे हरा नहीं सकेगी, तय है। जिसके पास इतने अपने हो, वो जीतता ही है। पत्नी की आस्था, मां स्वरूप भाभी का आशीर्वाद, बेटी स्वरूप बहुओं मीनू, रिंकी और सोनू की दुआएं तो बोनस थी, मेरी जिंदगी को और मौत से संघर्ष को।
सफर, चिंता, आंसू और चुहल
सफर जयपुर तक का भी लंबा था। धीरेन्द्र मेरे स्ट्रेचर के सामने बैठा था। एक अस्पताल में बेड नहीं था। महात्मा गांधी अस्पताल में संपर्क किया। अभिन्न मित्र अशोक कल्ला ने कहा, ले आओ। सब ठीक होगा। मैं व्यवस्था करता हूं। सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल भी इसी प्रयास में लगे थे। अशोक कल्ला और मेघवाल के अलावा राज्य के मंत्री भंवर सिंह भाटी, दिगज्ज नेता रामेश्वर डूडी भी अपने स्तर पर प्रयास कर रहे थे। सब सही हो गया।
तभी देखा, धीरेन्द्र की आंखे नम थी। अभिषेक तो आगे बैठा था और आंसू छिपा रहा था। मुझे अटपटा लगा। तब मैंने कहा- यार गाड़ी रुकवाओ। दोनों चौंके। गाड़ी रुकी।
– क्या हुआ?
– तुम लोगों ने यार मेरे साथ गलत किया।
वे दोनों आवक थे। अभिषेक तो बोला नहीं, मुंह घुमा लिया। धीरेन्द्र ने पूछा।
– क्या गलत किया?
– सुबह से मुझे नाश्ता नहीं कराया, नाश्ता तो कराओ भले लोगों।
उन दोनों के चेहरे खिल उठे। मुझे पता था, उन्होंने भी कुछ नहीं खाया था। नाश्ता किया और चल पड़े। अब वे दोनों कुछ आश्वस्त थे। सीधे अस्पताल पहुंचे। वहां तनवीर पहले से तैयार था। जांचें हुई। मेरी जिद के आगे वे झुके। रात निकाली। पर आखिरकार उनका मन रखने के लिए आईसीयू में जाने की मैने सहमति दी। उसके बाद तो वे बेहद खुश थे। युग भी पहुंच चुका था। आईसीयू में सारा मुझे ही झेलना था। बस, मौत से यहीं पर लड़ने का निर्णय कर लिया। क्योंकि मेरे सामने युग, धीरेन्द्र और अभिषेक के चेहरे थे।पत्नी डॉ चेतना, भाभी जी, मीनू, रिंकी, सोनू, बड़ी बहन आनंदी के अलावा पिता विद्यासागर जी का चेहरा जेहन में था। पिता और बहन को बिना बताये आये थे। उनको तकलीफ नहीं देना चाहते थे, मजबूरी थी कि उनसे झूठ बोला।
हौसला आफजाई करने वाले
रात को विधायक, काबीना मंत्री और मेरे अति निकटस्थ डॉ बी डी कल्ला का फोन आया। पूरी जानकारी वे ले चुके थे, हौसला बढ़ाया। द्वारका में थे, पर वहीं से अमरत्व पाने वाले ऋषियों का श्लोक सुनाया। फिर तो हर दिन वे डॉक्टरों से रिपोर्ट लेते। मुझे श्लोक सुनाते। मोटिवेट करते। उनकी और अर्जुराम जी की निरंतरता का कायल हो गया। अशोक कल्ला तो मित्र थे, उनका बूस्ट करने का निराला अंदाज था। वे कहते- यार, इनको जल्दी बीकानेर ले जाओ। यहां क्या काम। जबकि डॉ स्वर्णकार उन्हीं के परिचित, पडौसी थे और उनसे दिन में तीन बार स्वास्थ्य की जानकारी लेते थे।
पांच दिन तक आईसीयू में आत्म बल और अपनों की खुशी की शक्ति से पूरी ताकत लगाकर लड़ा। धीरेन्द्र, अभिषेक, युग के लिए छठा दिन राहत लेकर आया। जब सामान्य वार्ड में शिफ्ट करने का निर्णय सुना। तब तक मैं लड़ाई 60 प्रतिशत जीत चुका था। शेष 40 जीतूंगा, ये तय था। क्योंकि अब तो बेड के पास तीनों ही मेरे शेर थे। भांजी मनीषा और उसके पति मनीष जी भी रिस्क उठाकर आये, मगर मुझे मजबूत कर गये।
सभी की दुआएं और मनौतियां
यहां तीनों से बात होने लग गई तब पता चला कि शहर के कितने मेरे अपनों ने कितने जतन किये। हरीश के गहरे लगाव को मैं ही नहीं पूरा परिवार जानता था। उसे सीधे साथ चलने की छूट नहीं दी तो अपने स्तर पर जुट गया। युवा ज्योतिषी मनोज व्यास में उसकी और दूसरों की भी आस्था है। उससे जतन कराना आरम्भ कर दिया। टी राज काका और लोकेश जैन ने कोडमदेसर की पदयात्रा बोल दी। भाई इरशाद अज़ीज़ और उसके परिवार ने गेबना पीर धोक का संकल्प लिया। पत्नी को महादेव पर भरोसा था। भाई साब पंडित रामकिशन आचार्य जी ने पहले जयपुर आने की ज़िद की, उनको रोका। उन्होंने धरणीधर महादेव के सामने अपनी अर्जी रख दी। मुझे महादेव का चित्र भेजा। स्व चंद्रेश जी और सीमा भाटी ने भैरुनाथ से गुहार की। ऋतु शर्मा जी, रिंकी, आनंद जोशी, महेंद्र आचार्य ‘ चोंचिया महाराज’, अनुराग, आदि की अपने गणेश जी, महादेव, त्रिपुर सुंदरी, महानंद महादेव आदि से गुहार थी। अम्बालाल जी तो हर दिन माला के बाद एक ही सवाल करते कि मधु ठीक होकर आया या नहीं। उनका ये आत्म विश्वास संकट को भगाने वाला था। इधर युग, अभिषेक, धीरेन्द्र केवल डॉक्टरों के ही निर्देश नहीं मान रहे थे, मनासा के निर्देशों की भी अक्षरशः पालना कर रहे थे। उन उपचारों को बताना ज्योतिषीय नियमों का उल्लंघन होगा। कईयों ने संकल्प लिए पर बताया ही नहीं।
जब इतने अपनों के बारे में जाना तो आत्म बल कई गुना हो गया। अपनों के लिए जीने का जज्बा आ जाये तो मौत क्या हरेक को पराजित होना पड़ता है। मन में तय कर लिया कि जीतना ही है। सुधार इससे तेज हो गया।
ऐसे किया मौत को परास्त
तीन दिन बाद ही मुझे कॉटेज में भेज दिया गया। बहुत राहत में था। कोई भी जांच को तैयार था क्योंकि मन कह रहा था मैंने मौत को परास्त कर दिया। भास्कर में मेरे बॉस एल पी पंत जी, बिजली कम्पनी के पीआरओ अशोक शर्मा मिलने आये। फिर तो जीत तय हो गयी। अजमेर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.वीर बहादुर सिंह और सीकर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. के.के.वर्मा भी लगातार अपडेट्स लेते रहे।
डॉ सिरोही लगातार मेरे स्वास्थ्य की थाह ले रहे थे और बीकानेर से निर्देश दे रहे थे। उनको तो अब मेरे बीकानेर आने की प्रतीक्षा थी। वे अब अपनी देखरेख में मुझे रखना चाहते थे।
आखिकार, इस कड़े दौर को परास्त कर हम चारों बीकानेर के लिए रवाना हो गए। सीधे डॉ सिरोही के पास। उन्होंने देखा, जांचें की और कहा बचा 10 फीसदी मैं ठीक करूंगा और आपको कोडमदेसर लेकर जाऊंगा। बीकानेर आने पर परिवार ने केयर की और आज सामने हूं।
जो सीख मिली
इस संघर्ष से बड़ी सीख मिली। पहली, बीमारी से डरना नहीं चाहिए। दूसरी, अपने पर भरोसा रखना चाहिए। तीसरी, आत्म बल से हर जंग जीती जा सकती है। चौथी, अनुशासित दिनचर्या ही हर रोग की दवा है। पांचवीं, समय पर ईलाज लेना चाहिए। छठी, अपनों की दौलत पास रखनी चाहिए। सातवीं, अपनों के लिए जीने का सलीका आना चाहिए। आठवीं, किसी के छोटे से भी सहयोग को भूलना नहीं चाहिए। नौवीं, महामारी आये तो बचाव के निर्देश मानने चाहिए। दसवीं, खुद को लेकर लापरवाह नहीं होना चाहिए।
जैसा वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार व साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लॉयन एक्सप्रेस के चीफ रिपोर्टर आशीष पुरोहित को बातचीत में बताया।
साभार- लॉयन एक्सप्रेस व हरीश बी. शर्मा।




