May 21, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 17 सितंबर 2021। पिछले एक दशक से महंगाई बढ़ रही है। आम आदमी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान दिन ब दिन महंगा हुआ है। शासन कोई भी रहा हो, महंगाई बढ़ी है। किसी शासन में कम तो किसी में ज्यादा, बढ़ी है, ये सत्य है। महंगाई बढ़ने में अर्थ शास्त्री मानते हैं कि परिवहन के साधनों का खर्चीला होना है। इनका खर्च बढ़ाया है पेट्रोल और डीजल ने।
किसान का ट्रेक्टर हो या माल ढोने वाले कोई भी वाहन, इन्हीं दो पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग होता है। इनके दाम आदमी की उम्र की तरह बढ़े ही हैं, कभी घटे नहीं। हां, देश में कहीं चुनाव हो तो दाम थोड़े घट जाते हैं। इस चमत्कार की वजह केवल सत्ता ही समझती है। वोटर भी थोड़ा थोड़ा समझता है, पर चुनाव में उसको लेकर रिएक्ट नहीं करता। तभी तो चुनाव के बाद ज्यादा बढ़े दाम की चाबुक खाता है। अब तो महंगाई की चाबुक का वो आदी हो गया। क्योंकि उसे ये अहसास ही नहीं रहा कि प्रतिकार का अधिकार तो केवल उसके पास है। एक वक्त में डीजल के दाम तो पेट्रोल से आधे होते थे, मगर अब तो दोनों में बराबरी की होड़ मची है। अर्थ शास्त्री इस अजूबे को लेकर अचंभे में है।
एक राष्ट्र, एक नियम, एक दाम के सिद्धांत पर जीएसटी का नियम लाने का विचार पिछली केंद्र सरकार ने किया। वर्तमान सरकार ने इसे लागू किया। विसंगतियां हुई, उनको सुधारने के लिए संशोधन डर संशोधन हुए। अब भी हो रहे हैं, उस विषय में जाएंगे तो आंकड़ों में उलझ जायेंगे। इन दो पेट्रोलियम पदार्थों पर ही केंद्रित रहें तो सरकारों का सच जान पायेंगे।
जीएसटी लागू हुई मगर उससे पेट्रोल और डीजल को अलग रखा गया। इस निर्णय ने अर्थ शास्त्र की जानकारी रखने वालों के साथ साथ आम आदमी को भी चकित कर दिया। हालांकि आम आदमी जीएसटी के बाद इन दोनों उत्पादों के दाम तेजी से बढ़ने पर अचंभित हुआ। उसे ये उम्मीद नहीं थी, मगर अर्थ शास्त्री तो ये आशंका पहले ही जता चुके थे।
सरकारों के पास इनके दाम बढ़ने का रटा रटाया जवाब है, अंतरराष्ट्रीय कारणों से दाम बढ़ रहे हैं। ये कुछ हद तक सच है, मगर आधा सच। ये भी अर्थ जानकारों ने समय समय पर इसका खुलासा भी किया है। दुनिया के बाजार में अनेक बार दाम घटने के बाद भी हमारे यहां दाम बढ़े हैं। ये सच है। तब इनको जीएसटी में लाने की मांग जनता ने भी उठाई।
अब तो ये दोनों उत्पाद 100 के पार हैं तो इनको जीएसटी में लाने का दबाव सरकार पर ज्यादा पड़ रहा है। तभी तो गम्भीर चिंतन हुआ है। केंद्र व राज्य सरकारें बड़ी मांग के बाद भी इनको जीएसटी के दायरे में लाने से हिचकिचा रही हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों की हिचकिचाहट समझ आती है। क्योंकि कोरोना काल में जितना जीएसटी ने कमाकर नहीं दिया, उससे अधिक पेट्रोल और डीजल ने कमा कर दिया। हर राज्य का इन पर अलग टैक्स है, इसीलिए देश के हर राज्य में इनके दाम अलग अलग है। केंद्र अपना टैक्स तो लेता ही है। यदि ये जीएसटी में आ गये तो उनकी घट जायेगी।
केंद्र और राज्य सरकारों को महंगाई, अपनी जनता की जरूरत से ज्यादा अपनी आय से सरोकार है। इसीलिए सभी एक होकर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की बात नहीं कर रहे। दूसरी तरफ जनता इनके बढ़ते दामों से परेशान होती जा रही है। जन आक्रोश को समय पर नहीं पहचाना गया तो सरकारों के सामने समस्या खड़ी होगी। जनता की नब्ज को समझते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को इन्हें जीएसटी के दायरे में लाने का निर्णय करना चाहिए। तभी लोक कल्याणकारी गणराज्य की अवधारणा सच में पूरी होगी।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार