May 20, 2026
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आधे दशक से विपक्ष लगातार एक होकर भाजपा के नेतृत्त्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ एक होने की जद्दोजहद करता दिख रहा है। मगर यूपीए सहित विपक्ष संभलने के बजाय बिखर अधिक रहा है। ममता ने अब विपक्ष की राजनीति में आगे आकर बैटिंग शुरू कर दी है जो विपक्ष को एक करने के स्थान पर यूपीए जैसे गठबंधन को बिखेरने का का काम कर रहा है। ये लोकतंत्र के लिए बुरी मगर भाजपा के लिए अच्छी बात साबित हो रही है।
ममता ने बंगाल विधान सभा चुनाव में विशाल भाजपा को करारी शिकस्त क्या दी, ममता ने पूरे देश के लिए ही बंगाल चुनाव वाला नारा दे दिया, खेला होबे। मगर राज्य और देश की राजनीतिक स्थितियों में ज्यादा ही फर्क होता है। इसीलिए केंद्र सरकार पर असर होने के स्थान पर विपक्ष ही छिन्न भिन्न होने लगा। कांग्रेस की मंथर गति से नाराज पार्टी के नेताओं को, जो भाजपा में जाने से परहेज रखते हैं, उनको ममता विकल्प के रूप में मिल गई। ममता ने भी हमला दूसरे दलों और भाजपा के बजाय कांग्रेस पर ही अधिक बोला।
उड़ीसा, गोवा, बंगाल, त्रिपुरा, मणिपुर, हरियाणा, बिहार सहित अनेक राज्यों में कांग्रेस के नेताओं को ममता तृणमूल में ले आई। जिसमें सुष्मिता देव, अशोक तंवर, कीर्ति आजाद सहित कई नाम शामिल है। विधायकों को भी मणिपुर और गोवा में तोड़ा है। कांग्रेस का कमजोर होना विपक्ष का कमजोर होना ही है, ये राजनीतिक सच है। ममता यहीं तक नहीं रुकी है। बिहार में राजद, महाराष्ट्र में एनसीपी, यूपी में सपा को भी अपने नजदीक काफी हद तक लाई है। शिव सेना को भी ममता से परहेज नहीं। ये बिखरते विपक्ष की ही तस्वीरें है।
इसका उदाहरण चालू संसद सत्र में भी साफ दिख रहा है। किसान आंदोलन के सामने केंद्र सरकार पहली बार झुकी, विपक्ष एकजुट होकर उस पर हमला करता तो संभलना मुश्किल हो जाता। कांग्रेस ने संसद में विपक्ष को एक करने की पहल भी की, मगर तृणमूल उससे दूर रही। विपक्ष के बिखराव का लाभ केंद्र सरकार को मिला और वो बचाव के बजाय आक्रामक रूप में आ गई। अब भी मौका है, विपक्ष एक होकर बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर सकता है मगर ऐसा होता दिख नहीं रहा। महाराष्ट्र गई ममता ने शरद पंवार से मुलाकात की और तंज यूपीए व राहुल गांधी पर कसा, ये विपक्ष का बिखराव ही हुआ। लोकतंत्र मजबूत रहे, उसके लिए मजबूत विपक्ष पहली अनिवार्यता है। ये समूचे विपक्ष को समझना जरूरी है, अहम को छोड़कर।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार