






‘ लड़कियों के लिए मां की कोख और कब्र ही दो सुरक्षित जगह है। ‘ एक नाबालिग लड़की का ये सुसाइड नोट सभ्य समाज के मुंह पर तो तमाचा है ही मगर सरकारों के कर्त्तव्य, नागरिक के अधिकारों पर भी बड़ा सवाल है। क्या समाज लोकतंत्र के साथ विकसित होने के बजाय वापस आदिम युग की तरफ लौट रहा है, ये सवाल हर समझदार नागरिक को परेशान कर रहा है।
आज के एक अखबार में चेन्नई की छपी इस खबर ने हर समझदार को भीतर ही भीतर दुखी किया है। मन में आक्रोश को भरा है। गुस्सा तो इस बात से अधिक है कि ये सुसाइड नोट लिखने वाली बालिका नाबालिग है। एक नाबालिग बच्ची को जीवन का ये निष्कर्ष लगता है तो आदमी, सरकार, तंत्र के होने पर ही सवाल खड़े होते हैं।
खबर के अनुसार चेन्नई की एक यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग छात्रा ने आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में उसने अकेलेपन, परेशानी, अपने साथ हुई ज्यादती के बारे में बताते हुए लिखा है कि इस मुश्किल और तनाव भरे वक़्त में किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। लड़कियों के लिए मां की कोख और कब्र ही दो सुरक्षित जगह है। इस नाबालिग की ये बात हर संवेदनशील को झकझोरती है। क्या समाज इतना विद्रूप हो गया, क्या व्यवस्था इतनी लाचार हो गई। कड़े कानून बने हैं फिर भी इस तरह के कुकृत्य करने का साहस दरिंदों में क्यों आता है। पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा दिखता है।
ये नाबालिग एक सरकारी स्कूल की कक्षा 11 की छात्रा थी। वाह, सरकारी स्कूल की। पहले वो एक निजी स्कूल में पढ़ती थी। 9वीं पास करने के बाद उसने सरकारी स्कूल में दाखिला लिया था। माता पिता ने मीडिया को जो बताया, वो खबर का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि एक टीचर के बेटे ने उसे प्रताड़ित किया।
अब पुलिस सक्रिय हुई है। पत्रकारों ने मामले को उजागर किया तब हलचल हुई, समाज में और व्यवस्था में। पुलिस अपराधी को पकड़ भी लेगी। उसे सजा भी हो जायेगी, मगर वो बच्ची तो वापिस नहीं आयेगी।
क्या हम स्कूल, समाज में वो माहौल नहीं दे सकते जिसमें हमारी बेटियां सुरक्षित रहे। निर्भीक होकर अपने को विकसित कर सके। क्या समाज उसका गार्जियन नहीं था, क्या वो केवल एक मां बाप की संतान थी। हमारी सनातन परंपरा तो ये सिखाती है कि वो हमारी बेटी थी। उसकी रक्षा हमारा दायित्त्व है। तभी तो बहन, बेटी की सुरक्षा के लाख जतन सनातन परंपरा में है। उसके बाद भी इस तरह की शर्मनाक घटना हो जाती है जो शर्मसार करती है।
सरकार केवल कड़ें कानून बना देती है, मगर उसका असर तो दिख नहीं रहा। जीवन की पद्धति बदलनी होगी। संस्कारों की स्थापना फिर से करनी होगी। भूली अच्छी परम्पराओं को जीवित करना होगा। नारी के प्रति सोच को बदलना होगा। सरकार और व्यवस्था को अपने तरीके में बदलाव लाना होगा। सामूहिक प्रयास ही इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगा सकेंगे। इस घटना ने झकझोर कर एक बार फिर चिंतन का अवसर दिया है, समाज, सरकार और व्यवस्था को चिंतन करना चाहिए। ठोस रास्ते निकालने चाहिए ताकि समाज में बेटी बिना भय जी सके, सुरक्षित रहे। उसे केवल मां की कोख और कब्र सुरक्षित न लगे।
हो गई पीड़ पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिए
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



