May 21, 2026
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ऐन चुनाव से पहले समाज के हर वर्ग को सरकारें दनादन सहायता देती है। पहले घोषणाओं से ये राहत दी जाती थी अब सीधा लाभ देते हैं। सरकारों की ये नई परंपरा देखकर लगता है, राहत तो दी जा सकती है, फिर पूरे पांच साल ये काम क्यों नहीं होता। चार साल आठ महीने मिली तकलीफ को वोटर भूल क्यों जाता है। इस परंपरा को लोकतंत्र के लिए उचित तो नहीं माना जा सकता।
यूपी और पंजाब विधान सभा चुनावों से पहले वोटर पर धन की बारिश देखकर अचरज होता है। ये तो वोटर को सीधे प्रभावित करने का प्रयास है। जो न केवल सरकारों को अपितु वोटर को भी कटघरे में खड़ा करता है। जनता की छोटे या तात्कालिक लाभ को पाकर लंबे समय की तकलीफ का भूलना सही नहीं ठहराया जा सकता।
मंगलवार को यूपी में सरकार ने स्वयं सहायता समूह की 16 लाख महिला के खाते में 1000 करोड़ रुपये ट्रांसफर किये। इसी तरह मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, सखियों के खाते में भी पैसे ट्रांसफर किये गये। ये सहायता पहले भी तो इसी तरह सम्मान के साथ ट्रांसफर हो सकती थी, मगर नहीं की गई। जाहिर है, अब इसलिए की गई क्योंकि शीघ्र ही यूपी विधान सभा के चुनाव है।
इससे पहले एक साल तक किसान तीन कृषि बिलों को वापस लेने के लिए और एमएसपी गारंटी कानून बनाने के लिए आंदोलनरत थे। मगर उनकी सुनवाई नहीं हुई। न बात की गई। मगर अचानक उनकी मांगें मान ली गई। क्योंकि उनमें यूपी के किसान थे। यूपी में विधान सभा के चुनाव होने हैं।
यूपी में महिलाओं, विद्यार्थियों, श्रमिकों आदि को इसी तरह लाभ देने का सिलसिला चल रहा है। ये लाभ सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान भी तो समय पर मिलने चाहिए थे। मगर विपक्ष के हर वादे की काट के लिए सरकार सहायता देने में लगी है। राजनीतिक विश्लेषकों का ये कहना फिर गलत नहीं कि जनता को केवल वोटर माना जाने लगा है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इसी तरह पंजाब में भी बिजली मुफ्त, किसान को लाभ आदि के निर्णय सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से 6 माह पहले दिए जाने लगे। साढ़े चार साल ये विचार क्यों नहीं आया। वे ही तो लोग हैं, उनको मदद दी जा सकती थी। ठीक इसी तरह साढ़े चार साल मौन रहने के बाद आम आदमी पार्टी भी पहुंची और सहायता के वादों की झड़ी लगा दी। ये वादे वे चार साल पहले भी कर सकते थे। क्या सहायता का आधार वोट ही है, यदि ये है तो बहुत चिंताजनक है।
हर बार, हर चुनाव से पहले लगभग सभी राजनीतिक दल ये करते हैं। जनता देखती है मगर रिएक्ट नहीं करती। जो लोकतंत्र के लिए घातक है। जिस दिन सरकार और जनता, दोनों के व्यवहार में इस मसले पर बदलाव आयेगा, उस समय से ही सच में लोकतंत्र की स्थापना होगी। जनता की समस्याओं का स्थायी निदान होगा।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार