May 20, 2026
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जिस भी राज्य में विधान सभा चुनाव है वहां दलबदल देखने को मिल रहा है। ये माजरा क्या है। इतनी जल्दी किसी दल से निष्ठा कैसे टूटती है और नये दल से निष्ठा कैसे जुड़ जाती है, ये सवाल दलबदल कानून के बाद भी अनुत्तरित है। जो धीरे धीरे लोकतंत को कमजोर कर रहा है, क्या ये भान देश के राजनीतिक दलों को नहीं है ?
पहले बात गोवा की। छोटी सी विधान सभा, कम विधायक, मगर यहां भी दलबदल का बाजार गर्म है। टीएमसी और आप तो पूरी तरह इस खेल में लगी है। उसमें विधायक तक शामिल हो रहे हैं। तभी तो सवाल बनता है, यकायक क्या हो गया।
उसके बाद बात उत्तराखंड की। यहां भी दलबदल देखने को मिल रहा है। यहां सत्ता से जुड़े नेता दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो रहे हैं। साढ़े चार साल सत्ता से जुड़े रहे, तब दल गलत नहीं लगा। अब लग रहा है। पहले भी ये ही लोग उस सत्ता को छोड़ इस सत्ता के दल में आये थे। यहां साफ लगता है कि सत्ता के लिए दलबदल हो रहा है। साफ साफ लगता है ये दलबदल की ही श्रेणी है।
तीसरा राज्य है पंजाब। यहां भी चुनाव से पहले जमकर दल बदला जा रहा है। लगभग सभी दलों में ये देखने को मिल रहा है। जाहिर है ये दल के विचारों से जुड़ाव नहीं, सत्ता से जुड़े रहने का प्रयास है। सत्ता से जुड़ने की चाह में दलबदल तो बने कानून की श्रेणी में आना ही चाहिए। अभी यूपी तो बाकी है, जहां पिछले चुनावों के समय भी व्यापक दलबदल देखने को मिला था।
इस तरह का दलबदल लोकतंत्र को कमजोर करता है। क्योंकि कि नेता का समर्पण दल, विचार के लिए नहीं हैं, केवल सत्ता के लिए है। ये सोच लोकतंत्र की अवधारणा के सर्वथा विपरीत है। आम आदमी तो ये देखकर चिंतित है, मगर राजनीति नहीं। उसे भी सोचना चाहिए। केंद्र सरकार को इस मसले पर भी कोई एक राय बना दलबदल विरोधी कानून में संशोधन करना चाहिए। जो चुनाव को पवित्र रख सकेगा और लोकतंत्र की तब स्वाभाविक रक्षा होगी। नहीं तो स्थिति ज्यादा बिगड़ेगी।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार