






भाजपा पूरी शक्ति झोंकने के बाद भी बंगाल में ममता को हरा नहीं पाई थी। उस समय अखिलेश यादव ने ममता का साथ दिया था और चुनाव प्रचार कर खेला होबे नारे को बुलंद किया था। अब ममता उसी मित्र धर्म को निभाने सोमवार को लखनऊ पहुंची है और अखिलेश के खदेड़ा होबे नारे को बुलंद करेगी।
भारतीय मतदाता हिरोशिप का शिकार रहता है, उसका फायदा उठाने की कोशिश ही सपा – रालोद गठबंधन कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ गैर कांग्रेस विकल्प की कोशिश भी है ये। क्योंकि इस बार सपा और कांग्रेस का यूपी में चुनावी गठबंधन नहीं हो सका है और दोनों आमने सामने है। आम आदमी पार्टी भी यूपी में निशाने पर भाजपा के साथ कांग्रेस को भी रखे हुए है।
तेज गति से ध्रुवीकरण के प्रयासों ने यूपी विधान सभा चुनाव में तेज गति से स्थितियों को बदला है। बड़ी शक्ति थी यहां बसपा की, जो आक्रामक तरीके से चुनाव भी लड़ती आयी है। मगर इस बार सुर्खियां उसके इर्दगिर्द नहीं है, मगर उसका अपना वोट बैंक है। ये वोट बैंक अनेक विधान सभा सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा और सपा – रालोद गठबंधन की नजर इसी वोट बैंक पर है। पिछली बार एससी की अधिकतर सीटें भाजपा ने जीती थी, मगर इस बार उसके लिए ये राह कठिन है। उन सीटों पर सपा नेतृत्त्व गठबंधन ने खास ताक़त लगाई है तो बसपा भी वर्चस्व फिर से बनाने में जी जान से जुटी है। सत्ता की रेस में भाजपा और सपा गठबंधन है, ये राजनीतिक जानकारों का मानना है। मगर ये भी माना जा रहा है कि मायावती का रुख नया रंग दिखा सकता है।
पश्चिम उत्तर प्रदेश में 10 फरवरी को मतदान है, उससे ही तस्वीर साफ होगी और लोगों का नजरिया पता चलेगा। क्योंकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा ने ध्रुवीकरण के कड़ें प्रयास किये, मगर किसान आंदोलन की छांव में वे ज्यादा सफल नहीं हो सके। जाट बाहुल्य इस इलाके में किसान आंदोलन ही मुख्य मुद्दा है, अनेक गांवों में तो उम्मीदवारों को वोटर के कड़ें विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। वहीं यहां भाजपा विरोधी मतों के बंटने की भी कम उम्मीद है। क्योंकि इसी पर अखिलेश और जयंत चौधरी ने अधिक मेहनत की है।इस मतदान के बाद ही यूपी के बाकी हिस्सों में हवा का रुख साफ होगा।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



