






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 18 मई 2022। श्रीडूंगरगढ़ से निकटवर्ती गांव तोलियासर भैरव दरबार के रूप में विश्व प्रसिद्ध है परंतु आप इस गांव की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत से रूबरू नहीं होंगे तो जानिए श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स की इस विशेष रिपोर्ट में इस ऐतिहासिक गांव के विशेष ताने बाने को। तोलियासर में आज बहुतायत राजपुरोहित समाज है और आस पास के 52 गांवो के राजपुरोहितों की बडेर यही है। पुराने समय में सामाजिक न्याय के फैसले यहां स्थित ठाकुरजी मंदिर की चौकी पर होते थी। खास बात है कि कानून और कोर्ट के चक्करों से आज भी ये गांव दूर रहता है और पूरे गांव में गत तीन वर्षों में कोई तीन मामले मुकदमेबाजी के लिए पहुंचे होंगे। यहां ठाकुरजी मंदिर की चौकी की जाजम के प्रति आज भी गांव में श्रद्धा का भाव भरा हुआ है और युवा पीढ़ी इसे अपनी ऐतिहासिक धरोहर मानता है। इस जाजम पर बैठ कर समाज के पंच कई बड़े आयोजनों की रूपरेखा बनाते है। आज भी लोग अपने सामाजिक धार्मिक आयोजनों को सफल बनाने के लिए इस जाजम का उपयोग करते है। गांव में मान्यता है कि ठाकुरजी मंदिर की चौकी व जाजम दिव्य रूप में उनके पूर्वजों की तपस्या से फलित आशीर्वाद है।
तोलियासर का इतिहास, शौर्य व स्वाभिमान का प्रतिक।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। तोलियासर के युवा गर्वित भाव से अपने गांव को शौर्य व स्वाभिमान का प्रतिक बताते है। बुजुर्ग ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जोधपुर के राठौड़ वंशी राव जोधा के पुत्र राव बिकाजी के साथ वीर विक्रमसी ने जांगल प्रदेश की ओर प्रस्थान किया। देशनोक व कोडमदेसर में कुछ समय बिताने के बाद बिका ने राती घाटी में वीर विक्रमसी के सहयोग से वैशाख सुदी 2 शनिवार विक्रम संवत 1545 को बीकानेर की स्थापना की। यहीं विक्रमसी को रीड़ी बिग्गा क्षेत्र के चौरासी गांव प्रदान किए ओर विक्रमसी ने अपने बड़े बेटे वीर देवीदासजी को बीकानेर बुलाया। देवीदासजी जोधपुर के निकट बड़ली भैरव धाम से भैरव मूर्ति लेकर आए जो वर्तमान में भैरूंजी मंदिर वाले स्थान पर गिर गई थी। इसी स्थान पर भैरव मंदिर की स्थापना की गई। यहां तोलारामजी गोदारा जाट रहते थे व उन्हीं के नाम से गांव का नाम तोलियासर रखा गया। आस पास के 52 गांवो में राजपुरोहित परिवारों का प्रस्थान हुआ जो आज भी अपने गांव से पूरा सरोकार रखते है और आयोजनों में भाग लेते है। पूर्व में यहां जैन बनिए व स्वामी जाती के परिवार अधिक थे। गांव तोलियासर का राजस्व क्षेत्र करीब 84 हजार बीघा है और राजपुरोहितों की बडेर माना जाता है।




