






जी 23 के नेताओं में से एक कपिल सिब्बल ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। सपा के सहयोग से उन्होंने राज्य सभा की दावेदारी भी जता दी, पर किसी भी पार्टी की सदस्यता नहीं ली। खुद को निर्दलीय ही रखने की बात कही है।
अजीब सी बात है, कपिल सिब्बल ने कल बताया कि उन्होंने 16 मई को ही कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया था। मगर उसके बारे में मीडिया को न तो खुद सिब्बल ने बताया और न कांग्रेस ने कुछ कहा। पार्टी के भीतर रहकर खुलकर नेतृत्त्व पर सार्वजनिक बयानबाजी करने वाले सिब्बल त्यागपत्र के मामले में चुप रहे, ये बड़ी राजनीतिक पहेली है।
इस पहेली को उलझाया उनके स्वयं के कल दिए बयान ने। सिब्बल ने मीडिया से कहा कि वे निर्दलीय रहकर केंद्र सरकार के खिलाफ सभी को एकजुट करने का प्रयास करेंगे। उन्होंने फिर दोहराया कि वे कभी भाजपा में नहीं जायेंगे। सिब्बल ने बेबाकी से कहा कि दलीय सदस्य होने पर उन्हें दल का अनुशासन मानना पड़ता है, सदन में व्हिप की पालना करनी पड़ती है। मगर निर्दलीय सदस्य खुलकर अपनी बात कह सकता है। हालांकि उनका ये कहना राजनीति के जानकारों को सही नहीं लगा कि अभी कोई निर्दलीय इस स्थिति में नहीं है। वे अपनी बात कहे, दूसरों की नहीं।
राजनीति में रुची रखने वालों को उनके कल के एक बयान से घोर आश्चर्य हुआ। मीडिया के बारबार पूछने पर भी कल उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला। वे कहते रहे कि अब उस पार्टी में नहीं हूं तो उस पर नहीं बोलना चाहिए। बेबाकी से बोलने वाले सिब्बल की ये बात अचंभित करने वाली थी। सिब्बल ने कल ये भी स्वीकार किया कि उनके सपा, नीतीश, शरद पंवार, ममता आदि से अच्छे संबंध है इसलिए सबको एकजुट करने का प्रयास करूंगा। उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस से भी साथ में जुड़ने का कहूंगा।
जाहिर है कि कपिल सिब्बल को राज्य सभा में भेजने का टिकट सपा ने दिया है तो वे अखिलेश यादव की तारीफ करने से नहीं चूके। इतना तो राजनीतिक धर्म बनता ही है। अखिलेश ने भी अपने राजनीतिक समीकरण साधने के लिए सिब्बल के साथ का निर्णय किया है। आजम खान अभी उनसे नाराज चल रहे हैं और सिब्बल ने ही उनकी पैरवी कर माननीय न्यायालय से जमानत दिलवाई है। आजम खान भी उनको राज्य सभा में भेजने की ईच्छा रखते थे, अखिलेश ने उसे ही भांप पहल से सिब्बल को समर्थन दिया है। वे आजम खान को खुश करना चाहते हैं, क्योंकि चाचा शिवपाल से उनकी नजदीकियां बढ़ रही थी और चाचा अभी अखिलेश के सुर में सुर नहीं मिला रहे हैं। विधानसभा में भी बैठने के लिए अलग सीट की मांग की है।
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस की चुप्पी के भी गहरे राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे है। एक तरफ जाते हुए सिब्बल ने कांग्रेस पर कोई टिप्पणी नहीं की है तो पार्टी ने भी दो सप्ताह में उनको लेकर कोई बयान नहीं दिया है। वो तो उस चिंतन शिविर की चर्चा के बाद कमेटियां बना रणनीति बनाने में लगी है, जिसमें सिब्बल शामिल नहीं थे। शिविर में सिब्बल नहीं थे, मगर उस पर न वे कुछ बोले और न कांग्रेस। उसका राज अब पता चला है कि सिब्बल तो चिंतन शिविर से एक दिन पहले ही पार्टी को अपना इस्तीफा भेज चुके थे। इस तरह देखें तो ये कहना सही नहीं होगा कि चिंतन शिविर के बाद पार्टी छोड़ने वालों की संख्या बढ़ी है।
कपिल सिब्बल के जाने का कांग्रेस पर असर तो होगा मगर उनके नये रुख ने जरूर कांग्रेस को राहत दी है। सिब्बल अब गैर भाजपा राजनीतिक दलों को कैसे निकट लायेंगे, ये यक्ष प्रश्न है। मगर सिब्बल के राजनीतिक निर्णय ने सभी राजनीतिक दलों में हलचल जरूर बढ़ा दी है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



