






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 22 जून 2023। (हरीश बी. शर्मा) बीकानेर के खाजूवाला में जो हुआ, उसने सिर्फ एक युवती के सपनों को ही नहीं कुचला है बल्कि लाखों युवतियों को एक बार फिर से आशंकित कर दिया है। अर्थ तो यही हुआ कि हम ऐसे जंगली समाज में रहते हैं जहां युवती आज भी पुरुष के अधिकार-क्षेत्र में आती है। युवती की ना के कोई मानी नहीं है। यही नहीं, अगर वह अपने साथ हुए बर्ताव की शिकायत भी करती है तो सुनवाई नहीं होती।
गैंगरेप होता है!
हत्या कर दी जाती है!
जुल्मियों को बचाने पुलिस खड़ी दिखती है!
राजनीति आड़े आती है!
यह सब क्या है? क्या आरोपियों ने जो किया वह अपराध व्यक्तिगत है? भूखे मरते हुए किसी ने सेठ की दुकान से पचास रुपये चुराए हैं कि उसे छोड़ दिया जाए? हेलमेट नहीं पहनकर बाइक चला रहा था, जो उसका चालान नहीं कटे? खाजूवाली में पढऩे केे लिए जाने वाली दलित युवती के साथ जो हुआ है, वह समाज के प्रति अपराध है। समूची संवेदना को तार-तार होने का समय है। सिर्फ स्त्रियों के प्रति ही नहीं, उन पुरुषों के लिए भी शर्मनाक है, जो समाज को प्रतिनिधित्व देने की बात करते हैं। यह इतना भर मामला नहीं है कि मुआवजे और इमदाद पर खत्म हो जाए। एक युवती के पढऩे के सपने न सिर्फ कतर दिए गए बल्कि ऐसी इतने बेहूदे तरीके से नुमाइश की गई कि आने वाले समय में कोई भी युवती दबंगों की इच्छा के विरुद्ध जाने से पहले हजार बार सोचे।
ईश्वर करे कि ऐसा कोई संदेश नहीं जाए, लेकिन इस युवती के बाद अगर एक भी युवती घर से पढऩे के लिए नहीं निकलती है तो थू है समाज और सभ्यता पर। अगर एक भी लड़की अपनी इच्छा के अनुसार जी न सके तो धिक्कार है, उस व्यवस्था पर, जहां हम लिंग के आधार पर भेद नहीं करने की बात करते हैं। अगर एक भी मां अपनी बेटी को स्कूल भेजने से पहले यह कहती मिल जाए कि देखा नहीं खाजूवाला में क्या हुआ था तो डूब कर मर जाना चाहिए समूची पुरुष जाति को, जिसने कभी यह वचन दिया था कि हम स्त्री को अभय देेंगे। यह घटना इतनी सामान्य नहीं है और अगर, जिस तरह इसे हल्के में लिया जा रहा है खतरनाक साबित हो सकता है।
हम इस तरह का अन्याय कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। इस घटना के बाद सिर्फ मीडिया मुखर है। खबर दे रहा है, लेकिन बेअसर। जन-जीवन बेअसर। संवेदनहीन हो रहे समाज की यह पराकाष्ठा है, जब वह खबर में रोमांच तलाश रहा है। प्रतिरोध नहीं पनप रहा। स्त्री-वादी संगठनों ने कल भी किटी-पार्टियां की होंगी। गरीबों में खाना-कपड़े बांटे होंगे। इन पार्टियों में सिहरन तक नहीं दौड़ी होगी। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए भाजपा ने इस घटना के विरोध में ज्ञापन दे दिया। बड़े नेताओं के बयान आ गए। राजनीति हो गई। सरकार कांग्रेस की है तो समूची कांग्रेस चुप्पी साधे है, जैसे इस जुर्म को उसी ने किया है। यह बड़ी अजीब सोच है, कि जिस पार्टी की सरकार हो, वह देश या प्रदेश में होने वाले हर अनैतिक, अवैध और गलत कार्य के लिए उत्तरदायी मान ली जाती है। इस तरह की राजनीति से बचना चाहिए। आरोप अपने सिर पर लेने की बजाए समाज की जिम्मेदारी तय हो। इस बार में कोई संदेह नहीं कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन कानून तब काम करेगा जब साक्ष्य होंगे, सबूत होंगे। समाज की जिम्मेदारी यहीं से शुरू होती है कि समाज में अभय का माहौल बनाए। इस एक घटनाक्रम के बाद अगर एक भी युवती इस डर से पढऩे के लिए नहीं जाती है कि उसके साथ गैंगरेप होगा, फिर मार दिया जाएगा तो यह सिर्फ व्यवस्था ही नहीं, समाज के मुंह पर भी तमाचा होगा। महसूस करें एक करारा तमाचा!
“वरिष्ठ पत्रकार हरीश बी.शर्मा”



