






भारतीय न्याय सहिंता में प्रत्येक व्यक्ति को खुद की रक्षा करने का अधिकार दिया गया है। नये कानूनों में यह व्यवस्था कि गई है कि कोई भी व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में अपनी व अपने हितों कि रक्षा कर सके। यानी अपने शरीर या किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने समेत उसे अपनी संपत्ति या किसी और की संपत्ति, चाहे वह चल हो या अचल, को चोरी, डकैती या आपराधिक घटना के अपराध के विरुद्ध सुरक्षित रखने का अधिकार है। इसके विभिन्न पहलुओं को आज के आलेख के जरिये समझने का प्रयास करेंगे।
शरीर और संपत्ति की रक्षा का अधिकार:- भारतीय न्याय सहिंता कि धारा 35 निजी रक्षा के अधिकार के बारे में बताई गई है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को खुद की रक्षा करने का अधिकार है, यानी अपने शरीर या किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने का। इसी तरह किसी हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह अपनी और किसी अन्य व्यक्ति कि सम्पत्ति कि विभिन्न अपराधों से रक्षा कर सकें।
पागल या विकृत चित्त व्यक्ति के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा:- किसी व्यक्ति के बालकपन, समझ कि अपरिपक्वता, चित्त विकृति या पागलपन, या भ्र्म के कारण किया गया कार्य अपराध नहीं माना जाता है। परन्तु ऐसे कार्य के खिलाफ कोई भी व्यक्ति प्राइवेट प्रतिरक्षा का उतना ही अधिकार रखता है। जितना उस कार्य के अपराध होने कि दशा में रखता। जैसे एक व्यक्ति A है जो पागल है और वह किसी दूसरे व्यक्ति B पर जान से मारने का हमला कर देता है तो A को उतने ही अधिकार है। जीतने एक स्वस्थ आदमी से अपनी रक्षा करने के लिए होते है।
वो अधिकार व परिस्थितियाँ जब खुद कि रक्षा करते हुए हमलावार को मौत तक दे देना:- भारतीय न्याय सहिंता कि धारा 38 में शरीर की निजी रक्षा के अधिकार के प्रयोग में सात स्थितियों को बताया गया है। जो हमलावर कि मृत्यु का कारण बनने तक विस्तारित हैं। यदि अपराध यहाँ वर्णित प्रकृति का है:-
1. किसी तरह के हमले से मौत की आशंका हो सकती है या खुद को मरने से बचाने के लिए हमलावर को मौत तक पहुँचाना।
2. किसी तरह के हमले से गंभीर चोट लगने की आशंका हो सकती है तब खुद का बचाव करना।
3. बलात्कार करने के इरादे से किया गया हमला।
4. अप्राकृतिक वासना की संतुष्टि के इरादे से किया गया हमला।
5. अपहरण या व्यपहरण के इरादे से किया गया हमला।
6. किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक बनाने के इरादे से किया गया हमला, जिससे उसे यह आशंका हो कि वह अपनी रिहाई के लिए सार्वजनिक प्राधिकारियों या पुलिस या प्रशासन से संरक्षण नहीं ले सकेगा।
7. एसिड फेंकने का कार्य या प्रयास करने पर खुद का बचाव।
प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ:-
शरीर कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारम्भ हो जाता है जब किसी द्वारा अपराध करने का प्रयत्न किया जाता है या दी गई धमकी से शरीर पर संकट कि आशंका हो जाती है। चाहे अपराध किया नहीं गया हो और ऐसा अधिकार तब तक बना रहता है। जब तक शरीर को संकट कि आशंका बनी रहती है।
सम्पत्ति कि रक्षा करते हुए प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार:-
सम्पत्ति कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार धारा 37 के निर्बधनों के अधीन दोषकर्ता कि मृत्यु या अन्य हानिकारित करने तक का है, इसके लिए निम्न परिस्थितियां बताई गई है।
1. डकैती
2. रात में घर में सेंधमारी
3. किसी भी इमारत, तम्बू या जहाज पर आग से होने वाली हानि, जो इमारत, तम्बू या जहाज मानव निवास के रूप में या संपत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग किया जाता है
4. चोरी, शरारत, या घर में अतिक्रमण
घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा:-
धारा 44 में बताया गया है कि किसी घातक हमले के दौरान खुद के बचाव के लिए अगर किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुंचने का जोखिम हो तो भी जानलेवा हमले के खिलाफ निजी बचाव किया जा सकता है। जैसे A पर भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है और उसकी हत्या करने का प्रयत्न किया जाता है और प्राइवेट प्रतिरक्षा के लिए लगता है कि वह गोली चलाए बिना अपनी रक्षा नहीं कर पायेगा तो ऐसी स्थिति मे वह गोली चला देता है तो यह अपराध नहीं होगा।
निष्कर्ष:- निजी प्रतिरक्षा का अधिकार भारत के नागरिकों के लिए आत्मरक्षा का एक हथियार है, लेकिन अक्सर कई लोग इसका इस्तेमाल बुरे उद्देश्यों या गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए करते हैं। यह सुनिश्चित करना न्यायालय का कर्तव्य है कि अधिकार का प्रयोग सद्भावनापूर्वक किया गया था या नहीं। निजी बचाव के अधिकार का लाभ उठाने की सीमा खतरे की वास्तविक आशंका पर निर्भर करती है न कि वास्तविक खतरे पर। यह अधिकार केवल कुछ स्थितियों में एक निश्चित सीमा तक ही बढ़ाया जा सकता है।




