






कल अचानक से घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम पेट्रोलियम कम्पनियों ने प्रति सिलेंडर 15 रुपये बढ़ा दिये। अब घर में काम आने वाला गैस सिलेंडर 1000 रुपये में मिलेगा। ये दाम हर घर का बजट बिगाड़ देंगे। एक तरफ देश में बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ रही है दूसरी तरफ घर के काम की हर चीज महंगी हो रही है। मुक्त बाजार ने महंगाई को तेजी से बढ़ाया है।
परिवहन के सारे साधन पेट्रोल और डीजल से चलते हैं, उनके दाम भी एक साल से कमर तोड़ रहे हैं। खाद्य पदार्थो का दामों में भी स्थिरता नहीं है। हर बार गृहणी को अपना बजट दुबारा बनाना पड़ता है। देश और प्रदेश की सरकार साल में एक बार बजट बनाती है मगर गृहणी को तो हर माह नया बजट बनाना पड़ता है। घर के बजट में कटौती आधार होती है तो सरकारों के बजट में बचत। ये गणित देश के अर्थ शास्त्री भी नहीं समझ पा रहे हैं। महंगाई को पर लगे हुए हैं।
रसोई गैस के दाम तो एक साल में 305 रुपये 50 पैसे बढ़े हैं। ये बहुत बड़ी वृद्धि है। राज्यों के कर की दर अलग है तो हर राज्य में दाम भी अलग अलग है। भारत में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि रसोई गैस का सिलेंडर 1000 तक पहुंच जायेगा। पटना में सिलेंडर की यही दर हो गई है।
जानकर बताते हैं कि मुक्त बाजार के कारण ही ये दाम कम्पनियों की मर्जी से बढ़ रहे हैं। आम आदमी की जरूरत है तो इसकी खपत भी कम नहीं हो सकती। केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना तो इन दामों के कारण बेमानी हो गई है। गरीब के घर, झोंपड़ी में अब सिलेंडर खरीदने की शक्ति ही नहीं रही। सरकार ने मुफ्त सिलेंडर बांटकर वाह वाही तो लूट ली मगर गरीब खाली होने के बाद सिलेंडर कैसे भरवायेगा, इसको लेकर लापरवाह हो गई। सीधे शब्दों में इस समस्या पर गरीब से बात करते हैं तो वो कहता है कि वोट के लिए सब हो रहा है।
अर्थ शास्त्र के जानकार तो लंबे समय से कह रहे हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों को जब तक जीएसटी के दायरे में नहीं लाया जायेगा, तब तक इनके बढ़ते दामों पर अंकुश लगना सम्भव ही नहीं। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस को जीएसटी के दायरे में लाने के मसले पर सरकार और विपक्षी दल मुंह छिपा रहे हैं। क्योंकि ये चीजें उनकी आय के बड़े साधन है। वोट की राजनीति में फ्री देने की परिपाटी सभी राजनीतिक दलों ने डाली हुई है और उसकी मार जनता पर ही पड़ती है। एक तरह से सरकारें जनता को ठगने का काम कर रही है।
महंगाई अब आम आदमी को विचलित कर रही है,जबकि सरकारें दूसरे मुद्दों को बड़ा बना जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। अब आदमी उकता गया है और भीतर उसके धुंआ उठ रहा है, जिसे राजनीतिक दलों ने नहीं पहचाना तो उसे अकल्पनीय विरोध का सामना करना पड़ेगा। इतिहास गवाह है कि जब आम आदमी जागता है तो सिहांसन का हिलना तय रहता है।
अब भी वक़्त है, सभी राजनीतिक दलों को स्वार्थ छोड़ जन हित में महंगाई पर अंकुश के लिए एक होना चाहिए। वर्तमान अर्थ कानूनों के अनुसार अब समय की मांग है कि पेट्रोलियम पदार्थों को तुरंत जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए। नहीं तो जनता ही आंदोलन के लिए बिना दलों के सामने आ खड़ी होगी, फिर उसे समझाने की कोशिश सफल नहीं होगी।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



