






पिछले एक दशक से लगातार कमजोर हो रही वाम राजनीति ने लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर दिया है। लोकतंत्र में वैचारिक स्तर पर अनेकता से एकता को तरजीह होती है मगर एक दशक से ये अनेकता हाशिये पर चली गई है, जो चिंता का कारण है।
पूंजीवाद और समाजवाद जब बराबरी पर आमने सामने होते हैं तो राजनीति में संतुलन रहता है और लोकतंत्र मजबूत होता है। मगर एक दशक से धर्म, जाति, सम्प्रदाय की राजनीति इतनी हावी हो गई कि सभी दल इसके पीछे भागने लगे। वाम दल ये कर नहीं सकता तो वो वोट और राज की होड़ में उलझकर रह गया। वोट के लिए धर्मनिरपेक्षता की वकालत करने वाले राजनीतिक दल भी राह छोड़ बैठे। नहीं तो बंगाल, त्रिपुरा, केरल, बिहार, पंजाब आदि राज्यों में सभी दलों को अपने राजनीतिक एक्शन से पहले बहुत सोचना पड़ता था, क्योंकि वाम दलों की उपेक्षा करने की स्थिति उनकी नहीं थी। धर्म, राष्ट्रवाद आदि के मुद्दे खड़ें किये गये और वाम दल जनता और वोटर से दूर होते गये। वाम दलों की कमजोरी होते ही धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले दल भी अपने को बदलने लगे। यहीं से चिंताजनक स्थिति बनने लगी जो अब बेकाबू हो रही है।
पिछले बंगाल विधान सभा के चुनाव ने तो वाम राजनीति पर सवालिया निशान ही खड़ा कर दिया। जहां ढ़ाई दशक तक राज किया वहां शून्य पर आ गये। थोड़ी बहुत साख बची तो केरल में।
उसी के प्रतिफल में अब यूपी विधान सभा के आने वाले चुनाव को देखना चाहिए। भाजपा तो आरम्भ से धर्म से जुड़कर राजनीति कर रही है मगर बाकी दल भी यहां धर्म की शरण में चले गये हैं। कांग्रेस, सपा, आप जैसे दलों की वर्तमान गतिविधियां तो यही साबित कर रही है।
मगर इस हालत के लिए केवल दूसरे दल, वोट की राजनीति ही जिम्मेवार नहीं है, कमी वाम दलों में भी है। उन्होंने भी अपना मूल्यांकन कर धारा को नहीं बदला। परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने का निर्णय राजनीति के जानकार गलत मानते हैं, वहीं से तो गड़बड़ शुरू हुई। अब भी समय है, वाम राजनीति को आत्मावलोकन करना चाहिए और देशकाल, परिस्थिति के अनुसार अपने में वाजिब बदलाव करना चाहिए, तभी दो मुख्य धाराएं जिंदा रहेगी। कई दल आसानी से अपनी राह नहीं बदल पायेंगे। लोकतंत्र में दो पक्ष, दो विचारधारा का होना जरूरी है। तभी जनता के लिए भी राहत होती है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार
(ये लेखक के स्वयं के विचार है)



