






कांग्रेस के बिना देश में मजबूत विपक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती, ये सच है। मगर कांग्रेस के भीतर के संघर्ष को भांपकर गैर कांग्रेसी दलों ने विपक्ष बनने की कवायद आरम्भ कर दी है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस के लिए बड़ी चुनोती मान रहे हैं।
जी 23 के कांग्रेस के नेता तो सार्वजनिक रूप से नेतृत्त्व को लेकर सवाल खड़े कर चुके हैं और मौके की तलाश में है। हालांकि इन नेताओं ने जीवन भर भाजपा की खिलाफत की है इसलिए उसमें जाने की हिचक तो है। कुछ नेताओं को छोड़ दें तो अधिकतर दूसरे दलों की राह पर चलने की सोच रखते हैं। कांग्रेसी परिवार की सुष्मिता देव को खास जगह मिली हुई थी पार्टी में, फिर भी उन्होंने कांग्रेस छोड़ी। मगर भाजपा का दामन नहीं पकड़ा। ममता के साथ गई। ममता भी तो पहले कांग्रेस की ही थी।
त्रिपुरा वाम दलों का गढ़ था जिसे भाजपा ने पिछले चुनाव में ढहा दिया। उसका साथ कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़कर दिया। मगर अब ममता की टीएमसी ने वहां भी अपनी ज़मीन तलाशी है, इस बार भी आधार कांग्रेस के ही नेता है। ममता के भतीजे त्रिपुरा, असम सहित पूर्वोत्तर राज्यों में टीएमसी को खड़ा करने में लगे हैं। वे ये साबित कर रहे हैं कि मोदी का विकल्प कांग्रेस नहीं, ममता बनर्जी है। यही बात अब खुद ममता बनर्जी ने कह दी है। इसका असर कांग्रेस पर पड़ा है। पूर्वोत्तर में कई नेता जो भाजपा में नहीं जा सकते, टीएमसी का दामन थामने लगे हैं। गोवा में भी ममता ने पांव पसारे है। महाराष्ट्र में भी अंदरखाने प्रयास हो रहे हैं और सब जगह ममता ही सक्रिय है। अब तो यूपी में भी दखल का बयान देकर ममता ने नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस इस हालत से अंजान नहीं है, इसीलिए प्रियंका और राहुल आक्रामक हुए हैं। मगर पार्टी के भीतर के असंतोष को अब भी थामने में सफलता नहीं मिल रही। अच्छी स्थिति के बाद भी पंजाब में कांग्रेस अपनों से ही घिरी हुई है। हर दांव उल्टा पड़ रहा है।
राजस्थान के असंतोष का हल तो एक साल में भी नहीं निकला है। पायलट गुट के धैर्य की सीमा अब टूटने की स्थिति में है। आलाकमान बारबार घोषणा के बाद भी इस गुट को सत्ता में भागीदारी नहीं दिला पाया है। अब तो स्थिति गम्भीर हो गई है। यदि सचिन पायलट भी ज्योतिरादित्य, जतिन की राह चल पड़े तो कांग्रेस के लिए समस्या विकट हो जायेगी। क्योंकि ममता ने एक नया दरवाजा खोल दिया है। जो नेता भाजपा में नहीं जा सकते वे बेहतर विकल्प स्वीकारेंगे, ये भी तो मानना चाहिए।
ममता की लगातार अखिलेश यादव, शरद पंवार, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी से नजदीकियां तो ये ही संकेत दे रही है कि गैर कांग्रेसी विपक्ष के विकल्प पर प्रयास जरूर हो रहे हैं। ये हवाई बात नहीं। हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस के बिना मजबूत विपक्ष बनना सफल नहीं होगा।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



