






अनुकूल माहौल होने के बावजूद पंजाब में कांग्रेस अपनों की लड़ाई में उलझी है और चुनाव के महत्त्वपूर्ण समय को खो रही है। वहीं अकाली दल से अलग होने के बाद भाजपा ज़मीन तलाशने की कोशिश कर रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के सहारे के बाद भी अभी वो दौड़ में शामिल ही नहीं हो पा रही। आम आदमी पार्टी अपने कदम होले होले रख बड़ा धमाका करने की कोशिश में लगी है। अकाली दल और बसपा अभी तक भी ठोस कदम नहीं रख पा रही जबकि इनका समझौता काफी पहले हो गया था।
कांग्रेस में प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू के रोज के विस्फोटक बयान सभी नेताओं को एक साथ लाने में बाधा बन रहे है। सिद्धू ने पार्टी के घोषणा पत्र से पहले ही अपना पंजाब मॉडल जारी कर दिया, पार्टी आलाकमान कुछ कर भी नहीं पाया। शुक्रवार को उम्मीदवार तय करने के लिए हुई पार्टी की बैठक में सिद्धू, चन्नी और जाखड़ आमने सामने थे, जिसके कारण उम्मीदवार तय करना मुश्किल हो गया।
तीनों नेता अपने अपने लोगों को अधिक टिकट दिलाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि सीएम के लिए उनकी दावेदारी मजबूत रहे। चन्नी जनता के बीच जाकर खुद को मजबूत साबित करने में लगे हैं। सिद्धू के बयानों पर कांग्रेस के नेता टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं दिख रहे। कांग्रेस अपनों की इस खींचतान के चलते अनुकूल स्थिति का भी लाभ उठाने में पिछड़ रही है। पंजाब में पार्टी के लिए बेहतर स्थिति है मगर तब जब नेता मिलकर चुनाव लड़े। आपसी टकराहट कांग्रेस के लिए समस्या पैदा कर सकती है।
चुनावी सर्वे से आप उत्साह में है और अरविंद केजरीवाल फूंक फूंक के कदम रख रहे हैं। केजरीवाल यहां भी अपना दिल्ली फार्मूला लागू करने का वादा कर वोटर को लुभा रहे हैं। आप मे आपसी टकराहट न होने के कारण राहत है। केजरीवाल और मान कांग्रेस नेताओं की खींचतान का फायदा उठाने की कोशिश में है।
भाजपा को यहां खोने के लिए कुछ भी नहीं है इसीलिए उसने कैप्टन का साथ किया है, वो सत्ता की रेस में अभी तो नहीं लग रही। अपनी मजबूत उपस्थिति के लिए ही संघर्ष करती नजर आ रही है।
यहां की वर्तमान राजनीतिक स्थिति से स्पष्ट है कि एक समय में मजबूत दिख रही कांग्रेस अब संघर्ष की स्थिति में आ गयी है। यदि आपसी टकराहट और खींचतान कांग्रेस ने न छोड़ी तो उसके लिए मुश्किलें खड़ी होगी। पार्टी हाईकमान का हस्तक्षेप अब लाजमी लगता है। चुनाव में हर दिन का खास महत्त्व होता है और समय जाया करना पार्टी पर भारी पड़ता है।
कुल मिलाकर पंजाब का चुनाव नेताओं की टकराहट, दल बदल के कारण अब एकतरफा नहीं रहा, रोचक हो गया है। तभी तो राजनीति के जानकार कोई भविष्यवाणी करने से बच रहे हैं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



