May 21, 2026
26jan

शुक्रवार का दिन साहित्य, संस्कृति, भाषा और भारत के लिए खास बन गया। इस दिन लंदन में भारत की रचनाकार गीतांजलि श्री को उनके चर्चित उपन्यास ‘ रेत समाधि ‘ पर अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार अर्पित कर सम्मानित किया गया। ये गीतांजलि श्री के साथ हिंदी, भारतीय साहित्य, भाषा और राष्ट्र का सम्मान था। क्योंकि हिंदी का ये पहला उपन्यास है जिसे बुकर पुरस्कार मिला है।
बिंदास अंदाज, बोल्ड विचार मगर भारतीय संस्कृति को जीने वाली इस लेखिका की हिंदी साहित्य में खास पहचान है। अपनी साफगोई के कारण इस रचनाकार का लेखन भी बहुत सहज, सरल मगर गहरे अर्थ लिए हुए होता है। व्यवहार में गीतांजलि जितना हंसमुख है, लेखन में वे उतना ही गंभीर है। तभी तो उनके इस उपन्यास का रॉकवेल ने अंग्रेजी में अनुवाद ‘ टॉम्ब ऑफ सैंड ‘ नाम से किया था। हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी में दूसरे देश में अनुवाद होना भी कोई छोटी बात नहीं। क्योंकि साहित्य की दुनिया में ये माना जाता है कि भारत में फिक्शन पश्चिम से आया है। बुकर पुरस्कार फिक्शन राइटिंग के लिए ही दिया जाता है। इस पुरस्कार का पूरा नाम है मैन बुकर पुरस्कार फॉर फिक्शन। ये पुरस्कार दुनिया के हर रचनाकार का एक बड़ा सपना होता है।
गीतांजलि के इस उपन्यास में कथ्य बहुत छोटा है मगर उसमें बात बहुत बड़ी है। भारत – पाकिस्तान के विभाजन में एक महिला भारत आ जाती है। 80 साल की उम्र की ये वृद्ध महिला है जिसने जीवन में विभाजन से लेकर कई तरह के अनुभव न केवल देखे हैं अपितु जिये भी हैं। अपने पति के निधन के बाद ये वृद्ध महिला अवसाद यानी डिप्रेशन में आ जाती है। इसी के चलते वो वापस पाकिस्तान जाने का निर्णय कर लेती है। वहां उसकी किशोर और युवा अवस्था की यादें सजीव हो जाती है और उसके जख्म फिर से कुरेद देती है। उसी की कहानी है ये उपन्यास। जिसमें विभाजन की त्रासदी तो है ही मगर साथ में उस विभाजन से अभिशप्त हुए रिश्तों का भी गहन दार्शनिक विश्लेषण भी है। ये ही इस उपन्यास की खासियत है। क्योंकि कि इसकी कहानी बिना संवेदना, भाव व विचार के लिखी ही नहीं जा सकती। मानवीय व्यवहार की संवेदनात्मक पड़ताल करते करते गीतांजलि ने जीवन के अनछुए दर्शन की अभिव्यक्ति इस उपन्यास में की है। जब कोई इस उपन्यास को पढ़ने बैठता है तो न केवल अंत तक पढ़ता जाता है अपितु विभाजन काल, उससे बिखरते मानवीय रिश्ते और जर्जर होती संवेदना को भी जीने लगता है। ये इस उपन्यास लेखक की साफलता है। पाठक को सहज में उपन्यास अपने से जोड़ लेता है। पिछले कुछ समय में इस तरह की कृति कम ही सामने आई है। हर समझदार पाठक, लेखक, आलोचक इस उपन्यास को पढ़कर एक नये अनुभव से गुजरा है और कथानक पर सोचने को मजबूर हुआ है।
हर साल बीकानेर से निकलने वाली साहित्य वार्षिकी ‘ कथारंग ‘ के इस साल के अंक में भी ‘ रेत समाधि ‘ शामिल है। इस उपन्यास को खास मानकर संपादक हरीश बी शर्मा ने गीतांजलि श्री का साक्षात्कार साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित किया है, केवल इस उपन्यास पर ही उस साक्षात्कार में बात हुई है। हिंदी के कथाकार- कवि अनिरुद्ध उमट ने इस महत्ती उपन्यास की जानकारी सम्पादक हरीश को दी, वो भी प्रभावित हुए। प्रदीप सिंह ने इस उपन्यास पर उनका विस्तृत साक्षात्कार लिया, जो कथारंग वार्षिकी में प्रकाशित हुआ। उस समय तक तो इस उपन्यास के बुकर पुरस्कार में नामित होने की बात भी नहीं थी।
अनिरुद्ध उमट ने ‘ रेत समाधि ‘ पर बताते हुए पुरस्कार के लिए नामित होने से पहले कहा था- इस उपन्यास को जरूर पढ़ना। यूनिक है। संवेदना से लबरेज। रिश्तों की गहन पड़ताल है इसमें। भाषा और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग है गीतांजलि श्री के उपन्यास में। आज लगता है कि अनिरुद्ध ने कितना सही कहा था। इस उपन्यास ऊंचाई को पढ़ते ही पहचान लिया था।
दिल्ली के वुमन प्रेस क्लब में प्रितपाल कौर जी, राजेन्द्र जोशी जी की उपस्थिति में लंच के समय गीतांजलि श्री से हुई लंबी बातचीत भी याद आ गई। उनकी बातों से लगता था कि उम्र से कहीं अधिक बड़ा उनका अनुभव है। अपनी बात को बेबाकी से कहना उनका स्वभाव है। मुझे इस बात की खुशी है कि उसी, हमारी परिचित, कथारंग का हिस्सा गीतांजलि श्री को बुकर पुरस्कार मिला है। उपन्यास पर कथारंग से जुड़ी रही रचनाकार चित्रा मुदगल ने ठीक ही कहा है- जीवन की आकांक्षित पगडंडी पर न चल पाने की स्त्री मन की पीड़ा है ‘ रेत समाधि ‘ । बहरहाल इस उपन्यास के जरिये हिंदी साहित्य, भाषा, राष्ट्र सम्मानित हुआ। बधाई गीतांजलि श्री को।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार