






संसद के उच्च सदन के चुनाव 10 जून को है और उसके लिए सभी राजनीतिक दल उम्मीदवार चुनने में लगे थे, कुछ नाम सामने भी आ गये। उनको लेकर कमोबेश हर दल में हलचल है, कहीं बवाल है तो कहीं दबे स्वर में आश्चर्य के साथ असंतोष। सर्वमान्यता जो उच्च सदन की है, वैसी उम्मीदवारों को लेकर राजनीतिक दलों में नहीं है।
राज्य सभा का संविधान में गठन एक खास ध्येय से हुआ था। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ जो वोट की राजनीति से दूर रहते हैं, उनको इस सदन में लाना। ताकि उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ सरकार और सदन को मिले। इसी वजह से इस सदन में मनोनयन का भी प्रावधान है। मगर वक़्त के साथ परंपरा बदली और राज्य सभा में भी राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों के नेता आने लगे। वे नेता जो आम चुनाव में या तो पराजित हो जाते या ये चुनाव लड़ते ही नहीं। सभी दलों ने ये ही तरीका अपना लिया, उसी आधार पर राजनीतिक दलों ने इस बार भी उम्मीदवार तय किये हैं। शायद इसी वजह से हर राजनीतिक दल के नेता – कार्यकर्ता अपनी उपेक्षा सी महसूस कर रहे हैं। कुछ ने तो सार्वजनिक रूप से भी अपने दल के निर्णय पर सवाल खड़े कर दिये हैं। मगर ये सवाल ज्यादा असरकारक नहीं हो सकते, क्योंकि इसमें मत निर्वाचित विधायकों के है। आम जनता को मत का अधिकार नहीं, विधायक पार्टी के अनुसाशन से बंधे है। जिसे तोड़ना कई कारणों से संभव भी नहीं।
देश मे एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को पिछले दो आम चुनावों के साथ अनेक राज्यों में करारी हार सहनी पड़ी है। वर्तमान में उसका शासन केवल राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड में वो शासन में सहयोगी है। इसी कारण उसके पास उम्मीदवार भी कम ही जिताने के अवसर है। जबकि हारे हुए नेताओं की संख्या अधिक है।
उम्मीदवार चयन में इसी कारण कांग्रेस को ज्यादा ऊहापोह का सामना करना पड़ा है। जाहिर है, उम्मीदवार तय करने के बाद सर्वाधिक बवाल भी कांग्रेस में ही है। राजस्थान इसका उदाहरण है। यहां से कांग्रेस तीन उम्मीदवार जीता सकने की स्थिति में दिख रही है। ये ही एक बड़ा राज्य है जहां उसकी सरकार है। राज्य के अनेक नेता राज्य सभा मे जाने की आस लगाये बैठे थे, मगर उनको निराश होना पड़ा। पार्टी नेतृत्त्व ने हरियाणा के रणदीप सुरजेवाला, महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक और उत्तर प्रदेश के प्रमोद तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। जिनको चुनावों में पहले हार मिली हुई है। राजस्थान में कांग्रेस वैसे भी दो गुटों में बंटी है, जिनकी दूरी को अनेक प्रयासों के बाद भी पार्टी नेतृत्त्व पाट नहीं सका है। इसी राज्य में हार के बाद कांग्रेस का चिंतन शिविर हुआ था, कई निर्णय हुए मगर यहीं बाहर से उम्मीदवार उतारे गये। निर्णय और चिंतन में दूरी साफ नजर आ रही है। हरियाणा में भी हालत यही है। वहां दिल्ली के अजय माकन को उम्मीदवार बनाया गया है, जबकि सुरजेवाला हरियाणा के होते हुए भी राजस्थान से उम्मीदवार है। ये साफ दर्शाता है कि आलाकमान व राज्य की इकाई में गेप है। तभी बीच का रास्ता निकाला गया है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में भी उम्मीदवार अन्य राज्यों से है। कांग्रेस गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा को उम्मीदवार नहीं बना सकी है, जो जी 23 से चर्चा में आये थे। अब आगे क्या होगा, ये समय बतायेगा।
भाजपा ने भी नेताओं और कार्यकर्ताओं को कम विस्मित नहीं किया है। राजस्थान में घनश्याम तिवाड़ी का चयन अचंभित करने वाला है। इस उम्मीदवारी पर भीतर ही भीतर बातें नेता – कार्यकर्ता कर रहे हैं। यूपी, बिहार में भी ये ही स्थिति है। बिहार में जेडीयू और राजद के उम्मीदवारों को लेकर तो बवाल सार्वजनिक है। पंजाब में आप के उम्मीदवारों पर भी नेता – कार्यकर्ता सवाल तो कर रहे हैं।
सपा तो उम्मीदवार चयन को लेकर यूपी में पहले से ही चर्चा में है। सपा ने कांग्रेस छोड़कर आये कपिल सिब्बल को समर्थन दिया है, जो निर्दलीय लड़ रहे हैं। लोकदल से गठबंधन धर्म निभाते हुए आम चुनाव की रणनीति के तहत जयंत चौधरी को भी सपा ने उम्मीदवार बनाया है। अपने दल के हिस्से तीन में से एक ही सीट रखी है। नेता – कार्यकर्ता यहां भी विस्मित है अपनी पार्टी के निर्णय से।
कुल मिलाकर राज्य सभा चुनाव के बाद एक बार फिर से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे और उसकी जद में कमोबेश सभी राजनीतिक दल आयेंगे।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



