May 21, 2026
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पिछले तीन दिन से भाजपा के दो राष्ट्रीय अध्यक्षों, जो अभी केंद्र में मंत्री है, उनके बयान खासी चर्चा में है। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह के बयान गहरे राजनीतिक अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, ये हरेक मान रहा है। बयान राजनीतिक नहीं मगर राजनीति के कई अर्थ लिए हुए हैं। जिन पर राजनीतिक विश्लेषकों, नेताओं व राजनीतिक दलों में बहस छिड़ी हुई है, सबके अपने अपने तर्क है और व्याख्या भी।
पहले बात केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बयान की। आमतौर पर अखबारों और टीवी की सुर्खियों से दूर रहने वाले भाजपा के इस पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एक बयान के कारण चर्चा में है। नागपुर में एक कार्यक्रम में बोलते हुए गडकरी ने कहा कि कभी कभी मन करता है कि राजनीति छोड़ दूं। समाज में और भी काम है, जो बिना राजनीति किये करे जा सकते हैं। इस बयान को विपक्षी दल तो भाजपा के भीतर की कलह के रूप में परिभाषित कर रहे हैं, ये उनका धर्म है। मगर सच इतना भर नहीं है, बात अलग है।
जो लोग गडकरी के महाराष्ट्र के पीडब्ल्यूडी मंत्री और केंद्र के सड़क परिवहन मंत्री के काम करने के तरीके को जानते हैं, उनको ये बयान दूसरे अर्थ देने वाला है। गडकरी का ये बयान ये भी तो बताता है कि सामाजिक और राजनीतिक कार्य अलग अलग है, जिनको इस दौर में एक कर दिया है राजनीति ने। समाज के लिए काम करने वाले राजनीति में भी आये, ये जरूरी नहीं। समाज के काम और राजनीति के बीच एक रेखा खींचने की उनकी बात समय को देखते हुए वाजिब भी है। हां, राजनीति छोड़ने की उनकी बात जरूर सोचने को मजबूर करती है। मगर ये उनका व्यक्तिगत मामला है, उस पर कहने का हक़ केवल उनको है। हमें अर्थ निकालने के लिए मशक्कत नहीं करनी चाहिए।
महात्मा गांधी के समय की राजनीति का उदाहरण भी उन्होंने दिया और ये कहा कि अब बदलाव हो गया है। अब राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए होती है। ये बयान गम्भीर चिंतन के लिए कही गई है, जो आज के दौर में अहम भी है। इस पर गम्भीर विचार का अवसर गडकरी ने दिया है। तभी तो उन्होंने अपने बयान में जॉर्ज फर्नाडीस की राजनीति की तारीफ की। उनका बयान राजनीतिक चिंतन का आधार बनना चाहिए, केवल राजनीतिक बयान मान कुछ कहेंगे तो बात अधूरी ही रहेगी। बहरहाल, गडकरी के बयान ने देश में एक नई बहस जरूर छेड दी है। बहस होगी तो कुछ तो सार निकलेगा ही।
दूसरा बयान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जी का है। जिन्होंने कुछ अर्थों में पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यो की तारीफ की। ये कहना सच कहना है, हम नीतियों के विरोधी हो सकते हैं मगर जो अच्छे काम किये हैं उनकी तारीफ तो सच्चाई के साथ करनी चाहिए। राजनीतिक दल, विपक्ष के नेता तो इस बयान के अलग अर्थ निकाल राजनीतिक विश्लेषण कर रहे हैं मगर सच बोलने की तारीफ करने से बच रहे हैं। दिवंगत नेता अटल बिहारी वाजपेयी के संसद में इस तर्ज पर अनेक भाषण हुए हैं, इस बयान को भी उसी परिपेक्षय में देखा जाना चाहिए। कहीं से हो, किसी से हो, सच कहने का सिलसिला तो राजनीति में शुरू हो।
लेकिन गडकरी और राजनाथ सिंह के बयानों ने देश की राजनीति में एक नई बहस को अवश्य जन्म दिया है और इसके कई अर्थ निकलेंगे। जिनका अपना राजनीतिक प्रभाव भी पड़ना तय है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार