






पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों ने आजादी के बाद की भारतीय राजनीति को एक बार पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। ये चुनाव परिणाम जन मानस के नये सोच की तो अभिव्यक्ति है ही, साथ ही बदलते राजनीतिक समीकरणों का भी प्रतिबिंब है।
इन चुनाव परिणामों ने ये साबित कर दिया कि भाजपा का जादू तोड़ना आसान नहीं। उसके नेताओं मोदी, अमित शाह, योगी का किसी दल के पास विकल्प नहीं। उनकी चुनावी रणनीति के बराबर कोई दल नहीं। केवल जुबानी विरोध से भाजपा को हराना सम्भव नहीं। भाजपा भी जानती है कि बेरोजगारी है, महंगाई है, मगर इससे बड़ा राष्ट का स्वाभिमान है ये जनता को बता दिया। व्यक्ति और राष्ट्र के मुद्दों के सामने सारे मुद्दे गौण है, परिणाम तो यही बताता है। इसे भाजपा रणनीतिकारों का करिश्मा भी कह सकते हैं कि उन्होंने जनता को इधर उधर के मुद्दों की तरफ भटकने नहीं दिया। चुनावी जंग में भाजपा सिरमौर है, ये सभी दलों को स्वीकारना चाहिए।
भारत की जनता हिरोशिप में भी भरोसा करती है। उसने नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी को जब हीरो माना था तो इसी तरह से जिताया था। अब जनता के हीरो मोदी, योगी, शाह है, जिनका असर भी है। दूसरी तरफ विपक्ष में इस तरह का कोई हिरोशिप वाला नेता नहीं है।
सबसे अधिक राज करने वाली कांग्रेस की स्थिति विचारणीय है। उसे लगातार जनता नकार रही है, इस स्थिति पर पार्टी गम्भीर भी नहीं लगती। क्योंकि कैडर नहीं है संगठन के पास। नेता तो हैं पर कार्यकर्ता नहीं। नेता भी अभी तक आपस में टकरा रहे हैं, पंजाब इसका उदाहरण है। जनता ने कांग्रेस को वोट दिया है, मगर उतना ही कि वो खुद के बारे में सोचने का काम करे।
राष्ट्रीय स्तर पर भी जी 23 की बात चलना, कांग्रेस में सब ठीक न होने का संकेत है। कांग्रेस में पूरे मंथन की अब जरूरत है, नहीं तो हालत में सुधार सम्भव नहीं। जिन दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी की सरकार है, वहां भी टकराहट है। जो यहां चुनाव होने पर सुखद परिणाम तो नहीं देगी। कांग्रेस पूरे देश में है, मगर चुनावी जंग के लिए मजबूत नहीं। पार्टी को एक बड़ें मंथन के बाद अपने में बड़े सुधार की जरूरत है।
जनता ने बंगाल में ममता, महाराष्ट्र में शिव सेना, झारखंड में हेमंत सोरेन, तमिलनाडु में स्टालिन, केरल में सीपीएम, दिल्ली के बाद पंजाब में केजरीवाल का विकल्प चुना है। इसलिए जब मजबूत विकल्प होगा तभी वो निर्णय बदलेगी। कांग्रेस को इन छोटे दलों की रणनीति समझ अपने को भी सुधारना चाहिए। मगर इन चुनावों से राजनीति में बड़ा बदलाव आया है, ये तय है। जनता यूं ही किसी को जनादेश नहीं देती, हारने वालों को सोचने का भी अवसर देती है। बशर्ते हारने वाले सोचें।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



