May 20, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 18 अगस्त 2021।
                साभार- हरीश बी. शर्मा
जीवन के प्रति मोह कम होने का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संसार से भागने लगता है। वह स्वयं को सीमित करते हुए शिकायतें कम कर लेता है और चुप्पी साध लेता है। इस तरह जीवन को छोडऩे की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। एक दिन वह जीवन छोड़ भी देता है। मंगलवार को इसी तरह एक और काया ने जीवन छोड़ दिया। लक्की ने फंदा लगा लिया। लक्की दिवंगत सीआई विष्णुदत्त बिश्नोई का 17 वर्षीय बेटा। कारण क्या रहे होंगे, इस पर अब तक जब पिता की आत्महत्या की जांच रिपोर्ट भी सामने नहीं आई है तो 17 साल के बेटे के सम्बंध में क्या पता चलेगा, लेकिन यहां जांच रिपोर्ट से अधिक जो समझने वाली बात है वह यह कि हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं।

यह माना जा सकता है कि जब कोई आत्महत्या करता है तो अवसाद अपने चरम पर होता है, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है’ जैसा विचार हावी होता है, लेकिन यह क्षणिक आवेश ही तो है, जिसके बाद आत्महत्या करने वाला खुद के परिवार को ही संकट में डाल देता है।अगर इस तरह की घटनाएं ‘सीख’ बन जाये तो सोचकर देखें कि आज की पीढ़ी क्या सीख रही है, आत्महत्या करने वाला एक बार सोच ले कि उससे आने वाली पीढ़ी यह सीख भी ले सकती है तो संभव है वह कभी इस तरह का कदम नहीं उठाए।

लेकिन यहां यह भी सोचना जरूरी है कि आत्महत्या को सिर्फ अपराध की श्रेणी में शामिल करने से कुछ नहीं होगा बल्कि ऐसे लोगों के प्रति समाज के सकारात्मक भाव से परिणाम मिलेंगे, जो अवसाद पाले हैं। पराजय स्वीकार कर चुके हैं।

समाज को चाहिये कि ऐसे लोगों पर नजऱ रखें। ऐसे लोग भाई-बहिन, दोस्त या रिश्तेदार-सहकर्मी किसी भी रूप में हो सकते हैं। अगर मिलते हैं तो उन्हें अकेला मत छोडिय़े। अगर भागने की कोशिश करें तो पीछा मत छोडिय़े।

यह समय क्रूर है। लक्की से लेकर गंगाशहर थाने के कांस्टेबल बाबूलाल डूडी या नाथवाना के स्टेशन मास्टर विनोद कुमार द्वारा आत्महत्या करने के प्रकरण सिर्फ खबर भर नहीं है। लगातार आत्महत्या की घटनाओं को समझें तो पता चलेगा कि सब के अलग-अलग कारण हैं। कुछ कारण तो बड़े कारण भी नहीं है, सनकभर है।

ठंडे दिमाग से सोचें तो लगता है कि कोई अपनेपन से समझा भी देता तो ऐसा नहीं होता, लेकिन यह अपनापन ही तो रीत रहा है। खासतौर से इस कोरोना-काल ने व्यक्ति से व्यक्ति के बीच की दूरी बढ़ा दी। हमारी सामाजिकता इससे बेहद आहत हुई है, लेकिन यही रहा तो हम अकेलापन सह नहीं पाएंगे और अधिक अवसाद में जाएंगे। हमें यह मानना होगा कि हमारा सामाजिक तानाबाना अन्योन्याश्रित है। हम एक-दूसरे का अवलम्बन करते हुए ही आगे बढ़ते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से हम दूर होने लगे। कथित निजता ने हमें हर बात को छिपाना सिखा दिया। फिर कोरोना-काल ने इस पर मुहर लगा दी।

यह समय इन बातों को समझने का है कि किस तरह हम अपनों को बचाएं। इसके लिए सबसे बड़ी जरूरत है कि जो गलत है, उसे महिमामण्डित नहीं किया जाय। गलत को गलत मानना और उसे नहीं दोहराना ही सबसे आसान मार्ग है, जिसे अपनाने से तनाव, अवसाद और पराजय का भाव खत्म हो जाएगा।