






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 11 मार्च 2025। होली हमारे भारत देश का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। हर्ष, उल्लास और रंगों का यह त्योहार मुख्यतया: दो दिन मनाया जाता है, होलिका दहन और रंगो का पर्व धुलंडी। पहले दिन होलिका दहन होगा व दूसरे दिन लोग एक दूसरे को रंग अबीर गुलाल लगाते है, जिसे धुलंडी कहा जाता है। इस दिन हुलियारों की टोलियाँ ढोल बजा-बजा कर गलियों में घूम-घूम कर होली खेलती है। दिन भर लोग एक दूसरे के घर जा कर रंग लगाते है और गले मिलते है। होली के दिन लोग पुरानी से पुरानी कटुता को भूला कर गले मिलकर फिर से स्नेहबंधन बनाते है। ये परंपरा जीवन मे कोई दुर्भावना नहीं रखने की प्रेरणा देते है।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त व शुभ तिथि।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नारद पुराण के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को भद्रारहित प्रदोष काल में करना चाहिए, होलिका का दहन विधिवत रुप से होलिका का पूजन करने के बाद ही करना श्रेष्ठ है। भद्रा के समय में होलिका दहन करने से उस क्षेत्र में अशुभ घटनाएं हो सकती है। इसके अलावा चतुर्दशी तिथि, प्रतिपदा एवं सूर्यास्त से पहले कभी भी होलिका दहन नहीं करना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार अगर होलिका दहन के समय में भद्रा आ रही हो तो होलिका दहन का मुहूर्त हमेशा भद्रा मुख का त्याग करके निर्धारित होता है। क्योंकि भद्रा मुख में होलिका दहन बिल्कुल वर्जित है। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भद्रा मुख में किया होली दहन अनिष्ट को बुलावा देने जैसा है। जिसका दुष्परिणाम दहन करने वाले और उस शहर उस देशवासियों को भी भुगतना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त यदि भद्रा पूँछ प्रदोष से पहले और मध्य रात्रि के बाद भी हो तो उसे भी होलिका दहन के लिये नहीं लिया जा सकता क्योंकि होलिका दहन का मुहूर्त सूर्यास्त और मध्य रात्रि के बीच ही उचित माना जाता है।
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि गुरुवार 13 मार्च को प्रात: 10 बजकर 36 मिनट से शुरू होगी जो शुक्रवार 14 मार्च शुक्रवार को दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। लेकिन इस बार वर्ष 2025 में गुरुवार, 13 मार्च को होलिका दहन के दिन भद्रा लग रही है, भद्रा की शुरुआत पूर्णिमा तिथि के साथ ही होगी जो रात्रि 11:28 PM तक रहेगी, इसलिए होलिका दहन भद्रा के समाप्त होने के बाद ही किया जाएगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त गुरुवार 13 मार्च को रात्रि 11:28 से देर रात्रि 12:06 तक रहेगा। होलिका दहन पूर्णिमा में ही शुभ माना जाता है और प्रतिपदा, सूर्योदय, चतुदर्शी व भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जा सकता है। मूहर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार भद्रा काल में रक्षा बंधन और होलिका दहन दोनों को ही वर्जित बताया गया है। निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा काल में होली जलाने से देश पर संकट आ सकता है और देशवासियों को भयानक कष्ट का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए होली का दहन भद्रा काल में कदापि नहीं करना चाहिए।
इस वर्ष 2025 में होली पर चंद्र ग्रहण भी रहेगा।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। चूंकि यह चंद्र ग्रहण भारत वर्ष में बिलकुल भी दिखाई नहीं देगा, इसलिए इस चंद्र ग्रहण का सूतक काल एवं कोई यम- नियम भी भारत में मान्य नहीं होगा। यह ग्रहण अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और रूस व चीन के पूर्वी भाग में दृश्य होगा।
कथा के अनुसार अंतत: बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नारद पुराण में होलिका दहन की कथा मिलती है। इसके अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन अत्याचारी राजा हरिण्यकश्यप के कहने पर उसकी बहन होलिका हरिण्यकश्यप के पुत्र विष्णु भक्त प्रह्लाद को आग में भस्म करने के लिए उसे अपनी गोद में बैठाकर अग्नि में बैठ गई। शास्त्रों के अनुसार होलिका को यह वरदान था कि उसे अग्नि जला नहीं सकती है। लेकिन भगवान श्री विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करते हुए उसे आग में जलने से बचा लिया। वहीं होलिका वरदान के बाद भी अग्नि में भस्म हो गई। इसीलिए बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका का दहन किया जाता है। होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसके अगले दिन हर्ष उल्लास के साथ रंगों से खेलने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है।



