






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स।
भारतीय न्याय सहिंता मे उपहति व अवरोध के प्रावधानों को धारा 114 से 127 तक बताया गया है। सामान्य अर्थ मे उपहति का आशय किसी के द्वारा किसी अन्य को किसी प्रकार कि शारीरिक व मानसिक हानि पहुंचाने से लगाया जाता है जैसे मारपीट करना, थप्पड़ मारना, रास्ता रोकना, या किसी तरह का हमला करना। नये कानूनों में इसे अलग-अलग भागो मे बांट कर साधारण व गंभीर उपहति व उनकी सजा कि जानकारी दी गई है।
चोट पहुंचाना:- जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, बीमारी या अशक्तता पहुंचाता है, उसे चोट पहुंचाना कहा जाता है। यह भारतीय न्याय सहिंता मे धारा 114 के तहत बताया गया है।
गंभीर चोट:- बीएनएस की धारा 116 के अंतर्गत केवल निम्नलिखित प्रकार की चोटों को ही “गंभीर” कहा जाता है:
1. नपुंसकता.
2. किसी भी आँख की दृष्टि का स्थायी रूप से नष्ट हो जाना।
3. किसी भी कान की सुनने की क्षमता का स्थायी रूप से समाप्त हो जाना।
4. किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का विनाश या स्थायी रूप से क्षीण होना।
5. सिर या चेहरे का स्थाई रूप से विकृत होना।
6. हड्डी या दाँत का फ्रैक्चर या अव्यवस्था, कोई भी चोट जो जीवन को खतरे में डालती है या जिसके कारण पीड़ित को बीस दिनों तक गंभीर शारीरिक पीड़ा होती है या वह अपने सामान्य कार्यों को करने में असमर्थ हो जाता है।
स्वेच्छा या जानबूझकर चोट पहुंचाना:- जो कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी को क्षति पहुंचाने के आशय से कोई कार्य करता है, या यह जानते हुए कि उसके द्वारा किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचने कि संभावना है। और वह किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाता है, तो यह कहा जाता है कि उसने “स्वेच्छा से क्षति पहुंचाई है, यह धारा 115 (1) के तहत परिभाषित किया जाता है।
जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाना:- जब कोई व्यक्ति किसी को जानबूझकर स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचता है तो उसे घोर उपहति में शामिल किया जाता है। जिसका प्रावधान बीएनएस की धारा 117 (1) में किया गया है।
जैसे:- क, यह जानते हुए कि वह य के चेहरे को स्थायी रूप से विकृत कर सकता है, य को ऐसा मुक्का मारता है जिससे य का चेहरा स्थायी रूप से विकृत तो नहीं होता, किन्तु जिससे य को बीस दिन तक गम्भीर शारीरिक पीड़ा होती है। क ने स्वेच्छा से घोर उपहति पहुंचाई है।
सजा:- स्वेच्छा या जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाने पर सात वर्ष तक कारावास व जुर्माने कि सजा हो सकेगी एवं किसी प्रकार के हमले के द्वारा किसी व्यक्ति को स्थाई विकलांगता कारित करता है या लगातार विक्रतशील दशा में डाल देता है तब कम से कम दस वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान नये कानूनों मे किया गया है। वहीं पांच या अधिक व्यक्तियों का समूह मिलकर घोर उपहति या गंभीर चोट प्रदान करता है तब प्रत्येक को सात वर्ष तक कारावास व जुर्माने कि सजा दी जाएगी।
खतरनाक हथियारों या साधनों से स्वेच्छा से चोट पहुंचाना:- बीएनएस कि धारा 118 के अनुसार गोली चलाने, छुरा घोंपने या काटने के किसी उपकरण द्वारा, या किसी ऐसे उपकरण द्वारा, जिसका प्रयोग अपराध के हथियार के रूप में करने से मृत्यु हो जाने की संभावना हो, या आग द्वारा या किसी गर्म पदार्थ द्वारा, या किसी विष द्वारा या किसी संक्षारक पदार्थ द्वारा, या किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा, या किसी ऐसे पदार्थ द्वारा, जिसका श्वास लेना, निगलना या रक्त में मिल जाना मानव शरीर के लिए हानिकारक हो, या किसी पशु द्वारा, स्वेच्छा से चोट पहुंचाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
विशेष:- पुराने कानूनों कि सबसे प्रचलित धारा 323 जो हर मारपीट के मुकदमे में सजा के दौरान लागू होती थी वह अब 115 (2) हो गई है।
एसिड या तेजाब आदि का उपयोग करके स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना:- बीएनएस कि धारा 124 के अनुसार किसी के द्वारा किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग को स्थायी या आंशिक क्षति या विकृति पहुंचाता है, या उसे जख्मी या विकलांग या विकृत या अशक्त बनाता है या उस व्यक्ति पर तेजाब फेंक कर या तेजाब पिला कर या किसी अन्य साधन का उपयोग करके चोट या उपहति पहुंचाएगा या पहुंचाने की संभावना रखता है, गंभीर उपहति पहुंचाता है, तो अपराधियों को कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगी किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से दंडित किया जाएगा। बशर्ते कि ऐसा जुर्माना पीड़ित के उपचार के चिकित्सा व्यय को पूरा करने के लिए न्यायसंगत और उचित होगा।आगे यह भी प्रावधान है कि इस धारा के अंतर्गत लगाया गया कोई भी जुर्माना पीड़ित को दिया जाएगा।
संपत्ति हड़पने के लिए या किसी अवैध कार्य के लिए विवश करने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुंचाना:- जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से उपहति कारित करता है या चोट पहुंचता है। इस प्रयोजन से कि वह पीड़ित से, या पीड़ित से हितबद्ध किसी व्यक्ति से, कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या बस्तु प्राप्त करे, या पीड़ित को या ऐसे पीड़ित से हितबद्ध किसी व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य करने के लिए विवश करे जो अवैध हो या जिससे किसी अपराध का किया जाना आसान हो, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास से, जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा, दण्डित किया जाएगा और वह जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। इसका प्रावधान भारतीय न्याय सहिंता कि धारा 119 में किया गया है।
लोक सेवक को उसके कर्तव्य से रोकने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुंचाना:- जब किसी व्यक्ति को, जो लोक सेवक है, को कर्तव्य के निर्वहन से रोका जाता है या उस व्यक्ति को भयग्रस्त किया जाता है जिससे उसके द्वारा लोक सेवक के नाते किये जाने वाले कार्य मे रूकावट आती है तो अपराधियों को धारा 121 (1) के अनुसार पांच वर्ष तक की जेल हो सकेगी, वहीं लोक सेवक को गंभीर चोट पहुंचाने पर 121 (2) के अनुसार दस वर्ष तक कि सजा हो सकेगी।
विशेष:- पुराने कानूनों कि एक और प्रचलित धारा 341 अब भारतीय न्याय सहिता में धारा 126 (2) कहलाएगी और यह धारा विशेषकर रास्ता रोकने, बंधक बनाने जैसे अपराधों पर काम मे ली जाती रही है। जैसे कोई रास्ते में जा रहा है उसे रोकने पर सदोष अवरोध के तहत एक माह कि जेल व पांच हजार रुपए, जुर्माना लगेगा, वहीं सदोष परिरोध यानि किसी को किसी परिसर में बंधक बना लेना जैसा अपराध करने पर एक वर्ष तक कि जेल हो सकेगी, तीन दिन तक बंधक बनाने पर तीन वर्ष जेल व दस या अधिक दिनों तक बंधक बनाए जाने पर पांच वर्ष तक कि सजा होगी।
एडवोकेट अनिल धायल
9660801700




