May 20, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 8 दिसबंर 2021। एक साल से कुछ अधिक चला किसान आंदोलन आजादी के बाद का स्वर्णिम इतिहास माना जाये तो गलत नहीं होगा। अन्नदाता ने भारत के मूल सिद्धांत अहिंसा, लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को धैर्य रख मनवाया है। इसे राजनीति कहकर छोटा नहीं किया जा सकता। क्योंकि किसान ने खेत, घर छोड़कर सड़कों पर पड़ाव डाला और अपनी मांगों को सरकार से मनवाया।
किसान आंदोलन को जोर शोर से गलत बताने के प्रयास हुए। किसानों को राजनीति के फतवे दिए गए। मगर किसान अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुआ। अपनी मांगों पर जोर देता रहा। उन पर अड़ा रहा। लक्ष्य से भटकाव होता तो किसान सफल नहीं होता।
लोकतंत्र में ये भी पहला अवसर था जब समूचे विपक्ष ने किसी एक आंदोलन का समर्थन किया। किसानों ने अपने मंच को दलीय राजनीति से दूर रखा, दलों ने भी अपने कार्यक्रमों से किसान का समर्थन किया। राजनीतिक बयानों ने अनेक बार आंदोलन को गरमाने की कोशिश की मगर ऐसा हुआ नहीं। कुछ खट्टे मीठे अवसर जरूर आये। मगर उनको भी किसान नेताओं ने हज़म किया और अपनी राह नहीं छोड़ी। इसी वजह से एक दिन प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। ये किसान के लोकतांत्रिक उपक्रम की ही जीत थी।
मामला फिर भी अड़ा रहा। एमएसपी, किसानों के मुकदमें, पराली आदि पर भी किसान सरकार से हल चाहता था। 7 तारीख तक का अल्टीमेटम भी दिया। क्योंकि किसान जानता था कि मांगों के लिए बारबार आंदोलन नहीं हो सकता, इस बड़े आंदोलन से ही मुद्दों पर हल होना चाहिए।
समय भी नाजुक था। क्योंकि यूपी, पंजाब सहित पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव नजदीक थे। उन पर असर होना था। इसी कारण हल का समय निकट आया। 7 तारीख को सरकार ने किसानों को पत्र लिख सकारात्मक संकेत दे दिए। आज किसानों की समिति फिर विचार करेगी। एक साल तक चले इस लंबे आंदोलन का पूरा हल होने की उम्मीद जगी है। देर आये, दुरस्त आये। अन्नदाता तो सड़क से खेत पहुंचे। आने वाला समय किसान आंदोलन को याद रखेगा। क्योंकि और कुछ हुआ या न हुआ, ये तो साबित हो ही गया कि लोकतंत्र ही सही रास्ता है। किसान ने देश के आम नागरिकों को ये बड़ा संदेश तो दिया है। 8 तारीख यानी आज दोपहर 2 बजे किसानों की होने वाली बैठक से सबको उम्मीद बंधी है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार

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