






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 15 सितंबर 2021। बाबा साहब ने भारतीय संविधान की रचना कि तब ये तय किया कि शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा हर नागरिक को उपलब्ध कराना लोक कल्याणकारी राज्य का पहला कर्त्तव्य है। स्वास्थ्य की हालत का पता तो कोरोना काल में हर नागरिक को चल गया। आज एक दैनिक अखबार में आजादी के बाद राजस्थान के एक गांव में पहली बार स्कूल खुलने की खबर ने सोचने को मजबूर कर दिया। भरोसा ही नहीं हुआ, मगर सच तो सच है। सच पर भरोसा तो करना ही पड़ता है।
राजस्थान के जिले सिरोही में आबू पर्वत है और इसी में एक गांव है सिमति खेड़ा, इस गांव में आजादी के 75 साल बाद पहली बार प्राथमिक विद्यालय खुला है। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और इस गांव के लोग पहली बार स्कूल खुलने की खुशी मना रहे हैं। गौरतलब बात ये है कि ये गांव जन जाति बाहुल्य का है। जिनके कल्याण की अनगिनत योजनाएं केंद्र और राज्य सरकार में चल रही है फिर भी ये गांव अब तक शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित था।
जन जाति के बच्चे पढ़ना चाहते हैं और उनके अभिभावक उनको पढ़ाना चाहते हैं, इसका सबूत ये है कि पहले ही दिन इस प्राइमरी स्कूल में शिक्षा अधिकारियों के सामने 35 बच्चों ने प्रवेश लिया। अब तक इस गांव के बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने का जिम्मेवार कौन है ? क्योंकि मुख्य दोनों दलों की सरकारें केंद्र और राज्य में रही है। क्या किसी में साहस है कि इस कमी की जिम्मेवारी ले, शायद नहीं। क्योंकि सरकारों और नेताओं ने जन कार्यो की जिम्मेवारी तो लेनी बंद ही कर दी है, केवल प्रशंषा लेने की आदत है उनमें।
मजे कि बात ये है कि ये प्राइमरी स्कूल भी वहां के भामाशाहों की बदौलत खुला है। गांव के एक परिवार ने भवन उपलब्ध कराया, दूसरे ने स्कूल के लिए अलमारी। किसी ने टेबल कुर्सी तो किसी ने बैठने की दरियां। ग्रीन बोर्ड, स्टेशनरी भी गांव के लोगों ने ही उपलब्ध कराई।
इस खबर ने सरकारों के शिक्षा को लेकर किये जा रहे प्रयासों की पोल खोल दी है। ये खुशी की खबर नहीं, चिंता की खबर है। सरकारें और नेता तो चिंता नहीं करेंगे, जनता को ही जागना होगा। अपना हक मांगना होगा। ये सरकारों का भी दायित्त्व है कि वो जन जाति बहुल देश के सभी गांवों का पता लगाये कि वहां शिक्षण की व्यवस्था है या नहीं। मगर वोट से आगे तो राजनीतिक दल सोचते ही नहीं। वोट को केंद्र में रखकर राजनीति करने वालों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य कैसे प्राथमिकता पायेंगे, ये बड़ी चिंता की बात है। धर्म, जाति, सम्प्रदाय आदि में बंट रहे समाज को यदि शिक्षा का अधिकार ही मिल जाये तो अधिकतर समस्याओं का निदान हो जाये। मगर पहल कौन करे, जनता को ही करनी चाहिये। शिक्षा नीति को एक बार फिर बदलकर जनोन्मुखी बनाना चाहिए। जिसमें जमीनी सच भी हो, कागजी और हवाई बातें न हो, नहीं तो हम शायद बड़ा लोकतंत्र बोलने से हिचकेंगे।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



