






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 28 अक्टूबर 2020। श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में राज्य का सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है और इस क्षेत्र में 1999 के वर्ष में बड़ी शिकार की घटना हुई जिसके बाद श्रीडूंगरगढ़ में वन्य जीवों के लिए श्रद्धाजंलि का आयोजन जीव प्रेमी नागरिक करते है। 1999 से लगातार वन्य जीवों को श्रद्धाजंलि देने के लिए जागरण व हवन का आयोजन वन्यजीव समाधि स्थल पर किया जाता है इस वर्ष आयोजन ने 21वें वर्ष में प्रवेश किया है। मंगलवार रात यहां हवन व जागरण की परंपरा को निभाया गया। कोरोना गाइडलाइन के अनुसार जीव रक्षा संस्था द्वारा जाट छात्रावास के सामने स्थित समाधि स्थल पर छोटा कार्यक्रम श्रद्धाजंलि हेतु आयोजित किया गया। मंगलवार रात्रि को आचार्य बीरबलराम, राजाराम, किशनलाल, कैप्टन कृष्णा लटियाल ने भजनों की प्रस्तुति दी। जीव रक्षा संस्था के तहसील अध्यक्ष रामरतन धारणियां, कैलाश धारणियां, चुन्नीलाल टाडा, हरिनाथ सिद्ध पूर्व सरपंच ऊपनी, भगवानाराम गोदारा ऊपनी, हंसराज धारणियां सूरतगढ़, रामनिवास, रिषभ, शोभित व सांवतसर से धारणियां परिवार उपस्थित रहा। सभी ने जागरण व हवन के पश्चात वन्यजीवों को श्रद्धाजंलि दी।
इसलिए मनाया जाता है क्षेत्र में 27 अक्टूबर का दिन।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। 27 अक्टूबर 1999 को सांवतसर की रोही में शिकारियों ने 27 चिंकारा हिरण व 3 राष्ट्रीय पक्षी मोर को मार कर भाग रहे थे तो गांव के जीव प्रेमियों ने उनका पीछा किया। शिकारियों से मृत जीवों को छुड़वा कर पोस्टमार्टम करवाया गया व बीदासर रोड पर जाट छात्रावास के सामने वन विभाग की भूमि पर एक चबूतरा भी बनवाया गया। इस चबूतरे पर प्रति वर्ष श्रीडूंगरगढ़ के सभी जीव प्रेमी नागरिक एकत्र होकर उन निरीह जीवों की पुण्यतिथि मनाते है व उन्हें श्रद्धाजंलि देते है। बता देवें सांवतसर से कोटसर की रोही में हिरण व वन्यजीव बड़ी संख्या में है और इसकी जद में आने वाले सभी गांवो के नागरिक इन्हें अपने पारिवारिक सदस्यों की तरह स्नेह करते है।






