May 21, 2026
00

प्रदेश में भले ही छात्रसंघ चुनावों की घोषणा हो गई हो। यह भी कहा जा रहा हो कि दो साल बाद हो रहे चुनावों को बेसब्री से इंतजार था। समस्या यह भी आ रही है कि कुछ महाविद्यालयों में अभी तक प्रवेश परीक्षा भी पूरी नहीं हुई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आज के छात्र-छात्राओं को छात्र-संघ चुनाव की जरूरत है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सारे महाविद्यालयी छात्र-छात्राएं इन चुनावों में रुचि दिखाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस भावना के साथ छात्रसंघ चुनावों की शुरुआत की गई थी, क्या उनकी परिणिति हो रही है। इससे जुड़ा हुआ सवाल ही खड़ा होता है कि आखिर वो भावना क्या थी, जिसके चलते किसी भी महाविद्यालय में सारी व्यवस्था होने के बाद भी एक अदद छात्रसंघ प्रतिनिधि की जरूरत पड़ी। कभी उसके कार्यक्षेत्र, शक्तियां और अधिकार पर कोई बात हुई है।
अगर नहीं हुई तो छात्रसंघ चुनाव सिवाय लीक पीटने के अलावा क्या है, जिसमें राजनीतिक पार्टियां अपने लिए आक्रामक कार्यकर्ता तैयार करती है। छात्रसंघों का राजनीतिकरण करने की सबसे बड़ी दोषी तो राजनीतिक पार्टियां हैं, जिन्होंने सुनियोजित रूप से कैंपस में कांग्रेस, भाजपा और कम्यूनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता डाल दिए। हालांकि यह भी तथ्य है कि पिछल बीस साल में कैंपस से निकला छात्रसंघ अध्यक्ष बड़ा तीर नहीं मार पाया, लेकिन पिछला इतिहास देखें तो कांग्रेस-भाजपा को कई नेता कैंपस से ही मिले। ऐसे में पार्टियों का तो भला हुआ, लेकिन कैंपस में क्या सुधार आया।
छात्र-छात्रााओं के अध्ययन संबंधी सुविधाओं में विस्तार से लेकर समय पर परीक्षाएं करवाना, लेट-लतीफ प्रोफेसर्स पर निगरानी रखना और छात्र-छात्राओं के कल्याण के सोचने का जो कार्य छात्र-संघ अध्यक्षों के जिम्मे था, वह नहीं के बराबर हुआ। हालात यह है कि आज अगर रेंडम-सर्वे कर लिया जाए तो कॉलेज में पढ़ाई का माहौल ही नहीं बनता है। दोष छात्र-छात्राओं पर आ जाता है कि वे कॉलेज ही नहीं आते, ऐसे में पढ़ाई हो कैसे। लेकिन ऐसे छात्र-छात्राएं जो कॉलेज नहीं आते, उनके लिए सजा का प्रावधान है। उन्हें समझाने की व्यवस्था है, जो छात्रसंघ अध्यक्ष के माध्यम से अमल में लाई जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं होता। कई मामलों में तो छात्र संघ अध्यक्ष ही नदारद रहते हैं।
ऐसे में छात्र-छात्राएं अपनी समस्याएं सुनाए तो सुनाए किसे? यही वजह है कि छात्र-संघ अध्यक्ष की जरूरत नहीं के बराबर रह गई है। अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और कैंपस से एबीवीपी जीत रही है तो समझिये छात्र-संघ अध्यक्ष जीतकर भी अपने आपको अध्यक्ष नहीं समझता, और हावी रहता है एनएसयूआई का पराजित प्रत्याशी। कमोबेश यह स्थिति देशभर में है। जहां भाजपा की सरकार है और एनएसयूआई जीत रही है तो वहां का छात्र-संघ अध्यक्ष नख-दंत विहीन है। अब तक तो यह भी सामने आ गया है कि छात्र-संघ चुनावों में लगाया जाना पैसा भी बेकार है। इस ‘इन्वेस्टमेंटÓ का कोई भी सार नहीं है, क्योंकि यह शर्त नहीं है कि एनएसयूआई से निकला कांग्रेस का नेता बनेगा या एबीवीपी से निकले के लिए भाजपा रेड-कारपेट बिछाकर स्वागत करेगी। दोनों ही पार्टियों के पास अपनी यूथ विंग है, ऐसे में छात्र संगठन सिर्फ कैंपस की राजनीति करें, बाकी के लिए किस्मत की राह तकें।
यही सारी वजह है कि छात्रसंघ चुनाव अपनी चमक खोते जा रहे हैं। कुछ दिनों के ग्लैमर के लिए लाखों रुपये खो देना जिन लोगों को पसंद आता है, वे ही इस चुनाव की तैयारी में हैं। कम से कम ऐसे लोग इस रण में नहीं उतरेंगे, जिनके मन मेंं छात्रों का हित करवाना है। ऐसे में छात्रसंघ चुनाव के महत्व पर विचार करते हुए एक बार फिर से इन चुनावों को महत्वपूर्ण बनाने पर सोचा जाना चाहिए। इसके लिए पहली जरूरत है कैंपस से दलगत राजनीति को निकाल बाहर किया जाए। राजनीतिक संरक्षण में छात्र-राजनीति का मूल अभीष्ट असंभव है ।