May 21, 2026
26jan

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 10 जुलाई 2022। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मुर्मू के उत्तर प्रदेश दौरे ने खास राजनीतिक बदलाव के संकेत दिये। यूपी सीएम योगी ने मुर्मू के सम्मान में सीएम हाउस में डिनर दिया, परंपरा के अनुसार सभी दलों के नेताओं को निमंत्रण दिया। मगर कुछ खास राजनेताओं के जाने से ये डिनर नये राजनीतिक समीकरणों के संकेत दे गया। क्योंकि इससे पहले विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के आने पर ये नेता मुख्य विपक्षी दल सपा की बैठक में शामिल नहीं थे। सपा की बुलाई बैठक में शामिल होने से पहले आजम खान ने तल्ख टिप्पणी करके संकेत दे दिया कि मामला कुछ गड़बड़ है। आजम और सपा के रिश्तों में गांठ पड़ी साफ दिख रही है। हालांकि उन्होंने यूपी सीएम पर तो जमकर हमला बोला, मगर अपने दल से भी वो खुश नजर नहीं आये। ये तल्खी नये राजनीतिक समीकरण की तरफ ईशारा जरूर कर रही है। सपा की उस बैठक में अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल यादव को बुलाया ही नहीं। क्योंकि पिछले काफी समय से उनकी सीएम योगी से नजदीकियों की खबरें है। वे खुद भी अपने बयानों से नये राजनीतिक समीकरण के संकेत देते नजर आये। आश्चर्य तो तब हुआ जब पार्टी की सहमति के बिना वे सीएम आवास में हुए डीनर में शामिल हुए। कहा, कोई बुलायेगा तो मैं जरूर जाऊंगा। ये स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। यूपी विधानसभा चुनाव में सपा के बड़े सहयोगी और बड़बोले नेता राजभर भी योगी के डीनर में शामिल हुए। उनकी भी पिछले कुछ माह की गतिविधियां राजनीति में कुछ खास बदलाव का संकेत दे रही है। भाजपा उनके कड़वे बयान सुनने के बाद भी उन पर सॉफ्ट है, क्योंकि आम चुनाव पर उसकी नजर है। उनका यूपी के एक हिस्से में अपना वोट बैंक है। महाराष्ट्र की राजनीतिक उथल पुथल तो अब सामने है। शिव सेना को उनके ही नेता एकनाथ शिंदे ने तोड़ा है। तोड़कर शिंदे ने भाजपा से हाथ मिलाया है। भाजपा के अधिक विधायक होने के बाद भी सीएम पद शिंदे को दिया गया है और भाजपा डिप्टी सीएम पद से ही संतृष्ट है। ये सब निर्णय भी अगले आम चुनाव की छांव में हुए हैं। क्योंकि शिव सेना आम चुनाव में कांग्रेस व एनसीपी के सहयोग से महाराष्ट्र में भाजपा का बड़ा नुकसान कर सकती थी। इसीलिए पूरी रणनीति आम चुनाव को केंद्र में रखकर की गई। अब कांग्रेस में तोड़फोड़ के पीछे भी यही वजह है। दिल्ली में कांग्रेस बहुत कमजोर है। विधानसभा में उसका कोई विधायक नहीं है। सांसद तो है ही नहीं। उसके पास पूर्व विधायक है, वो भी वर्षों से पार्टी से जुड़े। अब वे भी दलबदल कर भाजपा में जाने को आतुर दिख रहे हैं। तीन दशक से जुड़े एक पूर्व विधायक व कद्दावर कांग्रेस नेता तो भाजपा में शामिल भी हो चुके हैं। ये भी आम चुनाव की तैयारी है क्योंकि उसमें भाजपा को आप से चुनोती मिलनी है, उसके मुकाबले की ही ये रणनीति है।
अकाली दल से अलग होने से पंजाब में भाजपा के सामने समस्या थी, क्योंकि वहां भी आप की सरकार बनी। इसीलिए अब आम चुनाव के नजरिये से भाजपा ने पंजाब पर फोकस किया है। यहां भी कांग्रेस के नेताओं ने दलबदल करके भाजपा का दामन थामा है। ये भी आम चुनाव की तैयारी की धमक है। कुल मिलाकर बाकी सभी विपक्षी दल तो अपने घर को संभालने में लगे हैं और भाजपा अगले आम चुनाव की तैयारी में अभी से लग गई है। आने वाले दिनों में कुछ और राज्यों में नेताओं के दलबदल के संकेत है, जिनका आधार भी आम चुनाव होगा। सार की बात ये है कि आम चुनाव में अभी डेढ़ साल से अधिक का समय है मगर उसकी तैयारी अभी से शुरू हो गई है। मगर विपक्षी अब भी चेते नहीं है।
मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार