May 20, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स(एक्सक्लूसीव रिपोर्ट)
रेतीले धोरों में तपती लू के बीच पुराने जर्जर मकान में ब्लू जिंस, इन शर्ट, जूतें और सिर पर टोपी के साथ बड़ी बड़ी मूछें, ये है गांव जालबसर का 41 वर्षीय नारायण। मराठी व अंग्रेजी सहित हिंदी में परिवार के साथ बातचीत करने की कोशिश करता, अपनी बूढ़ी माँ की राजस्थानी भाषा को समझने और अपनी बात समझाने के प्रयासों में जुटा है। महाराष्ट्र के पूणे में राठी हत्याकांड एवं लूट के मामले में पुलिस द्वारा बालिग अभियुक्त मान लेने पर सितम्बर 1994 से लेकर 28 अप्रैल 2023 तक 28 साल और 6 माह की जेल काटकर आया नारायण लूखा सामाजिक तौर तरीके सीख रहा है। ये दृश्य है निकटवर्ती गांव जालबसर का जहां दिवंगत चेतनराम चौधरी के घर पर 5 भाईयों के परिवार खुशी मना रहें है क्योंकि उनका छठां भाई नारायण सजा-ए-मौत के बाद फांसी का इंतजार करते करते नई जिंदगी पा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा कर दिया है। इसी वर्ष 28 अप्रैल को रिहा हुए नारायण उर्फ निराणाराम चेतनराम चौधरी अब अपने परिवार में शामिल नए सदस्यों व बच्चों से जान पहचान करते हुए सामान्य जीवन की ओर लौट रहें है। नारायण के जीवन का स्वर्णीम काल जेल में बीत गया और अब वे सेवा कार्यों से जुड़कर सकारात्मक ढंग से जीवन जीने की बात करता है।


आज है पिता की पुण्यतिथि, पिता के देहांत पर ही मिली थी मौत के अंधेरे में जिंदगी की रोशनी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। आज नारायण के दिवंगत पिता चेतनराम की पुण्यतिथि है और नम आंखो से उसने बताया कि पिता का देहांत 10 मई 2019 को हुआ था। तब वो 24 वर्षों से बाहरवें के दिन सात दिन की पैरोल लेकर गांव-घर आया था। पैरोल पर आने के दौरान नारायण को वर्ष 1994 में हुई हत्याओं की वारदात के समय खुद के नाबालिग होने के दस्तावेज मिले थे और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उसे सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा किया है। नारायण अब जेल के कठोर अनुभव भूलाना चाहते है और उनका कहना है कि लगता है जैसे ये नया जीवन उन्हें मिला है। नारायण ने बताया कि जेल में बिताए 28 वर्षों के दौरान 20 वर्ष हर दिन, हर रात यही डर सताता था कि आज फांसी देंगे, आज फांसी देंगे, डर के इस साए में एक एक दिन गिन कर काट रहें नारायण को रिहाई की उम्मीद अपने पिता की मृत्यु पर गांव आने के दौरान ही मिली।
डर को दूर करने में किताबें बनी सहारा, ढूंढा शिक्षा में उजाला, अब तीन भाषाओं पर पकड़।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नारायण ने जेल में रहते हुए अपनी शिक्षा स्नात्तकोत्तर तक पूरी की। उसने बताया कि जेल गया था तब 12 वर्ष का था और तीसरी कक्षा पास था। जेल में रहकर अपनी पढ़ाई प्रारंभ की और इस दौरान भले ही वह मारवाड़ी भाषा तो भूल गया लेकिन मराठी, हिंदी व अंग्रेजी भाषाओं पर अच्छी पकड़ बना ली है। नारायण ने बताया कि लगातार करीब 20 वर्ष अपनी मौत के बारे में सोचते हुए बीते परंतु जेल में भी मन में पढ़ने का ख्याल आया। अधिकारी व अन्य कैदी कहते कि क्या करेगा पढ़कर तुझे फांसी पर ही लटकना है। तो मैंने कहा मरना होगा तब मर जाएंगे पर तब तक कोई किताबें लाकर दो जिससे मैं अपने दिमाग को कहीं ओर लगा पाऊं। यहीं से किताबें उसका सहारा बनी एवं शिक्षा के उजाले से उसने अपनी अपील, आवेदन, नाबालिग के अधिकार आदि के बारे में जाना और उसका उपयोग किया।
सीखना है फोन, बाइक चलाना, सामाजिक रिवाजों को भी जानना है।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नारायण ने बताया कि जेल में रहते हुए वे बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट से गए क्योंकि फांसी की सजा प्राप्त आरोपी को अकेले एक सेल में रखा जाता है। हाथ भी बांध कर रखे जाते है और केवल सुबह 15 से 20 मिनट पकड़ कर घुमाया जाता है। नारायण ने बताया कि अब तो महिलाओं से बात करना भी नहीं आता और सामाजिक जीवन के बारे में भी ज्ञान नहीं है। नारायण ने बताया कि उन्होंने नया मोबाइल फोन ले लिया है और वे फोन चलाना सीख रहें है उसके बाद मोटरसाइकिल चलाना भी सीखेंगे।
भाई व परिवार खुश, माँ ने कहा मिली अब कालजा में ठंडक।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नारायण के भाई बीरबल व अणदाराम ने बताया कि भाई के लौट आने से वे प्रसन्न है। बीरबल ने कहा कि हमने कोई त्योहार या विवाह समारोह खुशी से नहीं मनाया क्योंकि सदैव मन में रहता की भाई जेल में है। गत दिनों परिवार के एक भाई का देहांत हो गया परंतु भगवान ने दूसरा एक भाई जिसके लौटने की उम्मीद नहीं थी हमें लौटा दिया है। नारायण के भतीजे अपने चाचा को अपने बीच पाकर प्रसन्न है। नारायण की माँ ने नम आंखो से मारवाड़ी में बताया कि इत्ता बरस कालजो धुक हो पर अब छोरो आग्यो तो कालजा में ठंडक मिली है।
फरिश्ते बने रिसर्चर विद्यार्थी, मानवाधिकार आयोग ने निभाया धर्म, दी नारायण को जिंदगी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नेशनल ला कालेज के रिसर्चर विद्यार्थियों की एक टोली देश भर में फांसी की सजा प्राप्त अभियुक्तों की मानसिक स्थिति पर रिसर्च कर रहा था एवं इसी दौरान वह जेल में बंद नारायण से मिला। यहां नारायण अपने गांव में मिले अपनी आयु के दस्तावेजों के साथ संघर्ष करने की कहानी उन्हें बताता है और पुलिस क्राईम रिर्काड में उसका नाम नारायण एवं गांव में मिले उम्र के दस्तावेजों में निराणाराम होने के कारण सुनवाई नहीं होने की फरियाद लगाई। इस पर रिसर्चर टीम ने उनके मामले को उठाया तो मानवाधिकार आयोग के वकिलों ने न्यायालय में दोनो एक ही व्यक्ति के नाम होने की पुष्टि करवाई। इसके बाद ही नारायण के रिहा होने के रास्ते खुले। नारायण के लिए ये रिसर्चर विद्यार्थी एवं मानवाधिकार आयोग के वकील फरिश्ते बन कर आए।

ये था मामला।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। ये कहानी एक आश्चर्यजनक सत्य की है जो भारतीय न्याय व्यवस्था के एक हैरान कर देने वाले मामले से जुड़ी है। अगस्त 1994 की पूणे राठी हत्याकांड एवं लूट की वारदात के समय नारायण की उम्र महज 12 साल थी लेकिन पुलिस का चाबुक ऐसा चला कि एक नाबालिग को पहले फांसी की सजा दिए जाने एवं अब 28.5 साल बाद रिहा होने की चर्चा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। रेगिस्तान के इलाकों से आज भी बड़ी संख्या में युवक रोजी रोटी की तलाश में बाहरी राज्यों में जाते है और ऐसे ही एक युवा की ये कहानी है। वर्ष 1994 में क्षेत्र के गांव जालबसर में चेतनराम लूखा का बेटा नीराणाराम भी घर से निकल कर पूणे पहुंच गया। यहां हुई एक वारदात में पुलिस ने 12 साल के निराणाराम को बतौर बालिग अभियुक्त नारायण बताते हुए सितंबर 1994 में गिरफ्तार किया। भारतीय दंड़ सहिंता के अनुसार नाबालिग अगर किसी क्राईम में शामिल हो तो भी उसके लिए बाल सुधार गृह का प्रावधान है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ और 1998 में सेशन कोर्ट ने मौत की सजा निर्धारित की। इसके बाद सितंबर 2000 में मुंबई हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट की फांसी की सजा को बरकरार रखा। फांसी की सजा पाए अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया पंरतु सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी की सजा ही रखी। नारायण ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दुबारा जाते हुए दया याचिका की थी जिसकी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सजा ए मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट में दुबारा जाने और दया याचिका लगाने से पहले नारायण ने राष्ट्रपति के समक्ष भी दया याचिका दी थी लेकिन वहां भी कोई राहत नहीं मिली। इतने सालों तक नारायण ने स्वयं भी अपनी उम्र संबंधी कोई प्रमाण नहीं दे पाया था। पुलिस ने चार्जशीट में उसकी उम्र 20-22 साल बताई थी और उसी आधार पर उसे मुख्य आरोपी बताते हुए सजाएं भी घोषित हुई थी। वर्ष 2019 में राशन कार्ड व स्कूल की टीसी से नारायण को वारदात के समय खुद की उम्र महज 12 वर्ष की ही होने का प्रमाण मिला। इसके बाद नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू याचिका लगाई और नाबालिग होने के साक्ष्यों पर कोर्ट ने सहमति जताई व जस्टिस अनिरूद्ध बोस, जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस ह्रषिकेश रॉय की बेंच ने आदेश सुनाते हुए नारायण चेतनराम चौधरी को रिहा कर दिया गया है।