






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 19 मार्च 2024। आजकल कहावतों का मतलब भी बदलते देखे जा रहें है और एक प्रसिद्ध कहावत “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की जगह आजकल “जिसकी सरकार उसकी भैंस” चरितार्थ हो रहा है। सत्तासीन नेता ही नहीं अधिकांश वर्ग इसी अंधी धारा की ओर बहते नजर आते है। ऐसे में क्षेत्र के गरीब की आवाज शासन प्रशासन के कानों तक पहुंच ही नहीं पा रही है। ये गरीब, मजदूर व श्रमिक वर्ग जिसे सरकार, नेता या अफसर से कोई लेना देना नहीं है इन्हें काम है तो केवल अपने घर का चुल्हा जलाने की जुगत से ही है। श्रीडूंगरगढ़ में शहरी क्षेत्र में कार्य करने वाले करीब 9 हजार श्रमिक जुलाई 2023 के बाद से ही अपने कार्य का भुगतान नहीं होने से बुरी तरह से परेशान है। वे आए दिन नम आंखो से अधिकारियों के सामने गुहार लगाते नजर आ रहें है। पालिका में गत जुलाई से ही कनिष्ठ तकनीकी सहायक नहीं होने के कारण इन श्रमिकों का भुगतान अटका है। पालिका में तत्कालीन अधिकारी अचानक ही नौकरी से चले गए और फिर विभागीय कार्रवाई के बाद भी नहीं लौटे। बहरहाल जो भी जुलाई से एक कार्मिक के नहीं आने से हजारों श्रमिकों का पेमेंट नहीं दिया जाना व्यवस्थाओं पर सवाल उठाता है। करीब 9 महिने से ये श्रमिक भुगतान की आस में काम कर रहें है। श्रमिकों में एक विधवा श्रमिक जिसने नरेगा के सहारे बच्चों को पालन की उम्मीद जगाई उसे भुगतान नहीं मिलने से उसके बच्चों का पालन पोषण भी मुश्किल हो गया है। श्रमिकों द्वारा लगातार कार्य व शहरी रोजगार सहायक द्वारा कार्य का निरीक्षण भी किया जा रहा है परंतु अनेक श्रमिक अपनी पेमेंट के लिए आए दिन अफसरों के दफ्तरों के आगे खड़े नजर आ रहें है। पालिका से जानकारी प्राप्त करने पर कनिष्ठ तकनीकी सहायक नहीं होने, कभी ईओ नहीं होने, डिजिटल हस्ताक्षर नहीं होने, कार्यकारी ईओ के सीट पर ही नहीं बैठने, के बहाने गिनवा दिए जाते है। परंतु मुद्दा किसी जरूरतमंद के घर चुल्हा जलने से जुड़ा है और इसे अनदेखा करना घोर लापरवाही को उजागर कर रहा है। इन 9 हजार श्रमिकों की 30 हजार लेबर हुई है और इनकी मेहनत के 28,89,908 रूपए विभागीय लापरवाही के सरकार के माथै कर्ज चढ़े है।
द्रवित करने वाला दृश्य..
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पालिका में एक कार्यालय के बाहर आंखो में आंसू लिए एक महिला भुगतान की गुजारिश करते नजर आई तो वहां उपस्थित लोगों के ह्रदय द्रवित हो गए। इस दौरान सबका सवाल एक ही था कि गरीब के हक के रूपए भी आखिर उसे क्यों भुगतान नहीं किए जा रहें है.? क्षेत्र का गरीब नरेगा श्रमिक दो जून की रोटी को तरस रहा है और नेता मुद्दे की नहीं स्वागत और सम्मान की कतारों में फूल मालाएं पहनने और पहनाने में व्यस्त है। अधिकांश श्रमिक पेमेंट करने का आग्रह लिए रोजाना पालिका के दर पर पहुंचते और नाउम्मीद होकर लौट जाते है। श्रमिकों ने दबी डरी आवाज में यही पुकारा कि जुलाई 23 से जनवरी 24 तक का भुगतान तो कम से कम शीघ्र किया जाना चाहिए।
नियमों की उड़ाई धज्जियां, जिम्मेदार आखिर कौन.?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। सरकारें भले ही नरेगा के माध्यम से प्रत्येक परिवार को साल में 125 दिन का रोजगार देकर पेट भरने लायक काम देने का वायदा कर रही है परंतु श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में इस वायदे की ही नहीं नरेगा नियमों की भी धज्जियां उड़ा दी गई है। जिन श्रमिकों की लेबर का भुगतान पखवाड़ा खत्म होने के 8 दिन के अंदर किया जाना होता है उन श्रमिकों को यहां 9 माह से भुगतान नहीं दिया गया है। ऐसे में अनेक सैंकडों गरीब परिवार जो अपने द्वारा किए गए काम का पैसा सरकार से लेने और उस पैसे से अपने घर में दवाई, अनाज आदि की व्यवस्था करने के लिए तरस रहें है। अपने घर के बच्चों को बिलखते और बुजुर्गों को दवाई के लिए तड़पते देख कर कुछ नरेगा श्रमिक तो खून के आंसू रोने को मजबूर है। इस शर्मनाक स्थिति के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है.? बहरहाल ये तंत्र सरकारी है और इसमें किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई या अमानवीयता के लिए सजा की उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा। पालिका के कार्मिकों की गुटबाजी हो या अधिकारी के नहीं आने की समस्या हो समाधान तो किसी जिम्मेदार अधिकारी को ही करना होगा। जिसका इंतजार इन गरीब परिवारों के सदस्य कर रहें है।
मुख्य नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। राज्य सरकार ने टी+8 नियम जो नरेगा भुगतान निश्चित समय से करने के लिए 14 मार्च 2019 को लागू किया था। जिसमें श्रमिकों के कार्य का एक पखवाडा पूरा होने के आठ दिनों के भीतर-भीतर अनिवार्य रूप से भुगतान देना होता है और यह भुगतान किसी भी सूरत में रोका नहीं जाएगा। इन 8 दिनों में विभागीय कार्रवाई पूरी होगी परंतु यहां एमबी ड्यू होने का बहाना बनाकर भुगतान रोक लिया गया है। एक जेटीए या जेईएन के नहीं होने से हजारों श्रमिकों का भुगतान रोक दिया गया है। आठवें दिन खाते में भुगतान होने की स्थिति में आज नौ माह से भुगतान नहीं होने से गरीब किस कदर परेशान हो रहें है। पूरे क्षेत्र में चर्चा है कि अपने एक दिन के वेतन कटौती के आदेशों की होली जलाने वाले राज्य कार्मिक आखिर इस वेदना को कब समझ सकेंगे। अब देखना ये है कि गरीब की इस लड़ाई में आखिर कब होगी उनकी सुनवाई और कब होगा नरेगा श्रमिकों को उनके हक का भुगतान।




