






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 30 मई 2025। राजस्थान के प्राचीन जल स्त्रोत जैसे जलकुंड, बावड़ियां न केवल यहां के जनमानस की साझा ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि ये दशकों से जल संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र रहें है। इनकी उपेक्षा और क्षरण से जल संकट गहराने लगा है। परंतु आज इनका महत्व लोकसामान्य के ही नहीं विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों व सरकारों के भी समझ में आने लगा है। घटते भूगर्भीय जल के हालात देखकर कहा जा सकता है कि इनकी पुनस्र्थापना और संरक्षण के प्रयास तेज किए जाने का समय आ गया है। श्रीडूंगरगढ़ अंचल में बिग्गा से तोलियासर कच्चे मार्ग का डामरीकरण हो रहा है। यहां पक्की सड़क का निर्माण किया जा रहा है। इस मार्ग पर एक ऐतिहासिक जलकुंड है। इस पारंपरिक जलकुंड का निर्माण करीब 7 दशक पूर्व संन्यासी भजनलाल स्वामी और उनके शिष्य मंगतूराम मेघवाल ने करवाया था। कई दशकों तक ये ग्रामीणों व राहगीरों के लिए प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण जल स्त्रोत रहा। आज इसकी स्थिति जर्जर हो गई है। चारों ओर कृषि ट्यूबवैलों की संख्या के कारण जन सामान्य में इसका महत्व कम आंका जाने लगा है। परंतु बुद्धिजीवी वर्ग जानता है वो दिन दूर नहीं जब यहां भी सीकर झुझुनूं के इलाकों की तरह धरती की गोद पानी से रीत जाएगी और तब प्यास बुझाने के लिए पुन: वर्षाजल पर होने वाली निर्भरता में यही जलकुंड उपयोगी होंगे। संभवत तब इन ऐतिहासिक स्त्रातों का महत्व भी समझ आने लगेगा। गांव बिग्गा के चितंनशील युवाओं ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए इन जलकुंडो के संरक्षण के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत बताई है। आज जब सरकार वंदे गंगाजल संरक्षण अभियान प्रारंभ कर जल स्त्रोतों का महत्व जन जन तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है तो ऐसे में क्षेत्र में बने ये जलकुंड यहां के लोगों की जागरूकता का प्रतीक रही है। आज जब चारों और लोगों की प्यास बुझाने के लिए उपयोगी जल स्त्रोतों को जीवित करने, वर्षा जल संरक्षण करने का आह्वान किया जा रहा है तो इन जलकुंड का संरक्षण भी आने वाले कल को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकेगा।





