






लालसोट में महिला चिकित्सक अर्चना शर्मा की आत्महत्या और धौलपुर में बिजली अभियंताओं के साथ मारपीट की घटनाएं सत्ता और व्यवस्था के बदलते चरित्र का संकेत है। यदि इनकी गंभीरता को समझे तो ये सत्ता, व्यवस्था के साथ समाज के लिए भी एक बड़ा कभी न भूलने वाला सबक है।
लालसोट की घटना तो ज्यादा अचंभित करने वाली है। इसमें सामान्य कानूनों का पालन भी व्यवस्था ने नहीं किया और हमें एक महिला चिकित्सक को खोना पड़ा। कौन होगा इसका जिम्मेवार ? क्या इसे एक सामान्य आत्महत्या ही माना जाना चाहिए ? जब चिकित्सक के खिलाफ धारा 302 में बिना जांच मुकदमा दर्ज नहीं हो सकता तो दर्ज कैसे हुआ ? उस चिकित्सक पर इतना मानसिक दबाव पड़ा कि उसे अपना जीवन बच्चों को छोड़कर खुद ही समाप्त करने की नोबत आ गई। क्या कसूर था उसके भरे पूरे परिवार का। उसको जो यातना मिली है उसका जिम्मेवार कौन है ? यदि ये तय नहीं होगा तो फिर ऐसी घटनाएं नहीं होगी, ये कैसे मान लिया जाये ?
कोई भी डॉक्टर अपने मरीज का बुरा नहीं चाहता, वो तो उसे ठीक कर दुआएं लेने की कोशिश करता है। ये कैसे मान लिया जाये कि डॉक्टर मरीज का दुश्मन हो जाता है, इस तरह के विचार जिस व्यवस्था के दिमाग में आये वो व्यवस्था ही सडांध मार रही है ये स्पष्ट दिखता है। हम क्यों भूल रहे हैं कोरोना काल को। जब सत्ता, व्यवस्था ने हाथ खड़े कर दिए तब चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने ही मोर्चा संभाला और महामारी से लोगों को बचाया। खुद की जान की परवाह नहीं की। उस समय चूंकि हमें लाभ मिला तो हमने उनको सराहा। जो चिकित्सक आम आदमी को बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा दे वो कैसे अपने मरीज का दुश्मन हो सकता है। ये विचार क्यों नहीं किया डॉ अर्चना के मामले में।
ये तो मीडिया और डॉक्टर के समाज विप्र फाउंडेशन ने आवाज उठा ली, यदि न उठायी होती तो कुछ नहीं होता। एक दुर्घटना बन के रह जाता ये मामला। समाज सामने आया तो सत्ता गम्भीर हुई। चिकित्सकों का संगठन भी मोर्चे पर आया। अधिकारियों पर कार्यवाही भी तुरंत हुई। उसके लिए सत्ता को साधुवाद। सामाजिक संगठन विप्र फाउंडेशन यदि लालसोट बंद नहीं करता, धरना देकर घेराव नहीं करता, जाम नहीं लगाता तो क्या होता ? चिकित्सकों का संगठन यदि पूरे प्रदेश में विरोध मुखरित नहीं करता तो क्या होता ?
जरूरत इस बात की है कि इस तरह की घटनाएं न हो, इसका पुख्ता इंतजाम जरूरी है। नहीं तो समस्या समाप्त नहीं होगी। जरूरत पड़े तो इस तरह के मामलों के लिए कठोर कानून बने और कड़ी सजा का प्रावधान हो ताकि फिर कभी व्यवस्था इस तरह का काम करने से झिझके। ये ही तो सत्ता का लोकतंत्र में मूल काम है। घटना के बाद कार्यवाही करना तो आधे दायित्त्व का निर्वाह है। उम्मीद है, सत्ता इस पर ठोस निर्णय भी करेगी। चिकित्सक के परिवार को सुरक्षा और सहायता देगी।
ठीक इसी तरह धौलपुर में बिजली अभियंताओं के साथ मारपीट भी अच्छी व्यवस्था का उदाहरण नहीं है। सत्ता ने कार्यवाही तुरंत की। जांच के आदेश भी दिये, मगर स्थायी समाधान ऐसी घटनाओं का भी जरूरी है। इन दो घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया है सोचने के लिए मजबूर किया है, ये सत्ता और व्यवस्था को सबक है, सोचने का अवसर है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



