May 21, 2026
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संसद के मानसूत्र सत्र को आरम्भ हुए 8 दिन हो गये, मगर संसद के दोनों सदन चल ही नहीं रहे। रोज सांसद तख्तियां लेकर सदन में आते हैं और सीट पर बैठने के स्थान पर वेल में खड़े रहकर तख्तियां दिखाते रहते हैं। आसन के सामने भी तख्तियां लहराते हैं, नारे लगाते हैं। पूरा देश ये सब देख रहा है, अचंभित भी है। परस्पर दोनों पक्षों के बयान आम आदमी को और उलझा देते हैं, वो तय ही नहीं कर पा रहा कि कौन सही है और कौन गलत ?
जो नारे लगते हैं, तख्तियों पर लिखा पढ़ने में आता है, उसके अनुसार विपक्षी सांसद बढ़ती महंगाई पर चर्चा चाहते हैं। आटा, दूध, दही आदि पर लगाई जीएसटी को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का वे नारा लगा रहे हैं। विपक्षी सांसद इन पर बहस चाहते हैं और आसन उनको अपने समय पर बहस करने की अनुमति देना चाहता है। टकराहट दिखने में तो इतनी भर है, जिसे आम आदमी इतना बड़ा होते देख चकित है। वो भी महंगाई पर लगाम चाहता है, फिर इस पर बहस न होना तो उचित नहीं। मगर दोनों सदनों में रोज नारे, तख्तियां, शोरगुल और सदन स्थगन, यही हो रहा है। आम आदमी चकित है कि इस मसले का हल निकालना कोई मुश्किल नहीं, फिर हल क्यों नहीं निकाला जा रहा।
हल के स्थान पर उसे जो अंत देखने को मिला वो तो ज्यादा आश्चर्यजनक है। अर्से बाद लोकसभा के 4 और राज्यसभा के 20 विपक्षी सांसद आसन ने सस्पेंड कर दिए। हो हल्ला होता है, तख्तियां लहराई जाती है, आसन के सामने कागज फेंके जा रहे हैं, मगर शोरगुल में सत्ता पक्ष के सांसद भी शामिल दिखते हैं जो विपक्षियों का विरोध करते दिखते हैं। मगर सस्पेंड केवल विपक्षी सांसद हुए हैं, ये बात कुछ अजीब लग रही है आम आदमी को।
वो अचंभित तो इस बात से है कि अब तक विरोध कुछ बातों पर था, जिसमें अब विरोध की पहली बात बदल गई है। अब पहली मांग निलंबित सांसदों को बहाल करने की हो गई है। वहीं सत्ता पक्ष अड़ा है कि उन सांसदों के माफी मांगने और फिर से ऐसा न करने का वादा करने पर ही उनकी बहाली होगी। अब पहले पायदान पर टकराहट का ये विषय आ गया है। ये टकराहट भी शीघ्र दूर होती नजर नहीं आ रही, यानि अभी संसद में कामकाज आरम्भ होगा, उसकी संभावना कम ही दिखती है।
इस तरह की बातें संसद में पहली बार नहीं हो रही, पहले भी होती रही है। जब सत्ता किसी दूसरे दल के पास थी। हां, इतनी संख्या में सांसदों का सस्पेंड होना कम ही हुआ है।
सोचने की बात है कि संसद को चलाने में जनता का इतना धन खर्च होता है, जिसको लेकर सभी दल चिंतित क्यों नहीं है। जबकि वे जीतकर तो जनता के लिए ही आते हैं। सत्ता और विपक्ष अपनी गलती मानने को तैयार नहीं, दोनों एक दूसरे को इसके लिए जिम्मेवार बता रहे हैं। राजनीतिक विद्वानों का मानना है कि सदन चलाने की प्राथमिक जिम्मेवारी सत्ता पक्ष की है, उसे ही समस्या का हल निकालना होता है। मगर वो भी बहुमत के कारण पहले की तरह अपनी जिद पर अड़ा है। विपक्ष भी अपनी बात पर अड़ा है और इसके लिए सत्ता पक्ष को जिम्मेवार बता रहा है। जिम्मेदार कोई भी हो, नुकसान जनता का है, ये तय है। उसका धन व्यर्थ जा रहा है, उसके मुद्दे सदन में नहीं उठ रहे। सब कुछ उससे जुड़ा है, मगर समस्या के निदान में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
सदन की ये समस्या नई नहीं, पुरानी है। इसलिए इसके निदान पर आजादी के 75 साल बाद तो कम से कम विचार कर निर्णय लेना ही चाहिए। नहीं तो जनता और उसके हित इसी तरह हाशिये पर पड़े रहेंगे। लोकतंत्र के हित में, जनता के हित में, राजनीतिक दलों को अपने दलीय हित त्यागकर निर्णय करना चाहिए। आम आदमी तो कम से कम यही चाहता है। क्या राजनीतिक दलों के केंद्र में आम आदमी आ पायेगा, ये यक्ष प्रश्न है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार