






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 13 मार्च 2021। श्रीडूंगरगढ़ अंचल में खेतों में जंगल की ज्वाला कहे जाने वाले राज्य पुष्प रोहिड़ा ने धोरों की धरती में जैसे रंग भर दिए है। ग्रामीण इलाकों में खेतों की ओर नजर जाने पर खिल रहे ये रोहिड़े के फूल आजकल नए सेल्फी पॉइंट बने हुए है। हालांकि रोहिड़े के पेड़ कम ही नजर आते है परन्तु रेगिस्तान में नागरिकों के लिए ये कुदरत का वरदान है। इसके खूबसूरत फूल नजर आते ही तन मन को सुकून देते है वहीं इसकी लकड़ी भी महंगी होती है। बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, जालौर, सिरोही, पाली, चूरू, सीकर, झुंझुनू जिले रोहिड़ा वृक्ष के ठिकाने है।
हमारा क्षेत्र रोहिड़े के लिए सर्वश्रेष्ठ जलवायु वाला है और किसान इसे अपने खेतों की सींव पर लगा सकते है। हालांकि इंसानों की छेड़छाड़ से न केवल रोहिड़ा के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है बल्कि जैव विविधता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा है। रोहिड़ा थार के रेगिस्तान का ऐसा वृक्ष है जो शुष्क और अर्ध शुष्क जलवायु में पनपता है। रोहिड़ा के वृक्ष पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस वृक्ष की सूखा सहन करने की क्षमता अपार है। यह रेगिस्तान की भीषण गर्मी में 43 डिग्री से 48 और कई बार 50 डिग्री तक के तापमान को झेलते हुए हरा भरा रहता है। इतना ही नहीं ये पेड़ न्यूनतम शून्य तक और कभी कभी शून्य से दो डिग्री कम तक के तापमान को सहन करने की क्षमता रखता है।
रोहिड़ा की खास बात इसके सुंदर और आकर्षक फूल होते हैं। साल में दो बार इस पर फूल आते हैं। दिसंबर अंत से जनवरी के बीच तथा मार्च और अप्रैल में पीले, नारंगी तथा लाल रंग के फूलों से रेगिस्तान में रंग भर देता है। बल्कि यूँ कहा जाये कि रेगिस्तान का श्रृंगार कर देता है। हालांकि रोहिड़ा के फूल खुशबू रहित होते हैं लेकिन देखने में काफी सुंदर होते है गंधहीन होने के बावजूद इसमें फूलों के आने पर मधुमक्खियां, तितलियां और असंख्य रसभक्षी कीट व तरह-तरह के पक्षी रस चूसने के लिए इसके चारों तरफ मंडराते रहते हैं। वहीं चारे के रूप में फूलों का सेवन बकरी भी बड़े चाव से करती है।









