






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 4 मई 2022। पिछले दो दशक से जब भी किसी राज्य में विधान सभा के चुनाव आते हैं, वहां पार्टियां बदलने का काम बड़े पैमाने पर होता है। कुछ समय पूर्व यूपी, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा में विधान सभा चुनाव हुए तब सबने देखा कि बड़ें पैमाने पर नेताओं ने दल बदला। कुछ ने सुनहरे भविष्य की आशा में तो किसी ने टिकट कटने की आशंका से दलबदल किया। आप को पंजाब में इससे बड़ा लाभ मिला। गोवा और यूपी में भाजपा लाभ में रही। सपा को तो बड़ी शक्ति दलबदल करके आये नेताओं से मिली। दल बदलने वाले हारे या जीते, ये अलग बात है मगर दलबदल खूब हुआ। इससे पहले मध्य प्रदेश, कर्नाटक में तो इस प्रक्रिया से सरकारें बदल गई।
आने वाले समय में गुजरात, हिमाचल, राजस्थान और एमपी में चुनाव होने हैं। अब इन राज्यों में भी ये सब होने की पूरी संभावना बन गई है। वर्षों से जिस दल में नेता है, उसको भी वे झटके से छोड़ने में परहेज नहीं कर रहे। भाजपा जहां इन राज्यों के दूसरी पार्टियों के असंतुष्टों पर नजरें लगाए हैं वहीं कांग्रेस अपने घर को बचाने में अभी से जुट गई है। इन राज्यों में अपने पांव जमा रही आप भी इसी प्रक्रिया से खुद को मजबूत करने में लगी है। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल तो सार्वजनिक रूप से दूसरे दलों के नेताओं को साथ आने का निमंत्रण दे रहे हैं। कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति अभी सही नहीं, इसलिए उसके नेता ज्यादा पाला बदल रहे हैं।
गुजरात के विधानसभा चुनाव खास होते हैं, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का ये ग्रह प्रदेश है। पिछली बार कांग्रेस ने भाजपा को चुनाव में कड़ी चुनोती दी थी। उससे भाजपा सतर्क है। इसीलिए उसने अभी से ही राजनीतिक समीकरण बनाने आरम्भ कर दिए हैं। सबसे पहले तो पटेल समुदाय के युवा नेता और कांग्रेस के गुजरात कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल के सुर बदले हैं। उनको लेकर असमंजस बन गया है। हार्दिक ने फ़ास्ट शुरुआत की थी मगर अब बदले बदले से लग रहे हैं।
दूसरा बड़ा झटका कांग्रेस को कल लगा है। कांग्रेस के तीन बार के विधायक अश्विन कोटवाल ने कल पार्टी छोड़ दी और विधायकी से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद वे भाजपा में शामिल हो गये। कांग्रेस को ये तगड़ा झटका है। काफी समय से कोटवाल पार्टी से नाराज चल रहे थे, क्योंकि उनको नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया गया था।
कोटवाल का जाना तो एक शुरुआत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार अभी कई नेता कांग्रेस को छोड़ भाजपा का दामन थामने की तैयारी में है। ऐसे लोगों के भाजपा नेतृत्त्व संपर्क में है। पांच साल का कार्यकाल नजदीक आते आते कांग्रेस के विधायक गुजरात में घटकर केवल 63 रह गए हैं। 2020 के राज्य सभा चुनाव के समय भी कांग्रेस के 8 विधायकों ने पार्टी छोड़ी थी। चुनाव नजदीक आते आते कई पाला बदल सकते हैं।
भाजपा भी इस तरह से दल छोड़कर आने वालों को पार्टी में शामिल करती जा रही है। क्योंकि चुनाव से पहले वो कांग्रेस के मनोबल को कमजोर करना चाहती है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस के नेताओं का मनोबल वैसे भी उहापोह की स्थिति में पहुंच गया है। चुनावी राज्यों में अगर भाजपा इस राजनीतिक उठापठक में सफल होती है तो वो चुनाव से पहले ही मनोवैज्ञानिक बढ़त ले लेगी। इसी रणनीति पर भाजपा काम कर रही है। क्योंकि गुजरात के चुनाव उसके लिए प्रतिष्ठा का सवाल है ही।
राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस आपसी टकराहट और असंतोष से घिरी है, उस पर भाजपा की नजर है। कई नेता कांग्रेस से नाराजगी भी जता चुके है। इस असंतोष पर भाजपा निगाहें टिकाए है। पंजाब में असफल रही भाजपा अब हिमाचल में बढ़ रही आप की गतिविधियों को भी थामने में लगी है। आप के प्रदेशाध्यक्ष अनूप केसरी सहित कई नेताओं को भाजपा अपने पाले में ला चुकी है। वो पंजाब की तरह आपको विस्तार देने में सफल नहीं होने देगी, प्रयास तो इसी तरह के दिख रहे हैं।
अब बात पीके की। कुछ दिन पहले कांग्रेस से जुड़कर उसे नई रणनीति का प्लान दे चुके पीके अब खुद ही सीधे राजनीति में उतरने का मन बना चुके हैं और बिहार से शुरुआत कर रहे हैं। बिहार इसलिए उनको मुफीद लग रहा है, क्योंकि वहां नीतीश और भाजपा के मध्य सब ठीक न होने की खबरें हैं। कांग्रेस इस राज्य में पहले से ही कमजोर है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि चुनाव की रणनीति बनाना एक अलग काम है और चुनाव लड़ना सर्वथा अलग। पीके के चुनावी भविष्य को लेकर अभी कुछ भी कहा नहीं जा सकता।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



