






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 19 फरवरी 2025। क्षेत्र के गांव सांवतसर में गुरू जंभेश्वर मंदिर में जाम्भाणी हरि कथा का आयोजन जारी है। कथा के चौथे दिन मंगलवार को कथावाचक आचार्य डॉ गोवर्धनराम ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि दुःख में सुख, हानि में लाभ, प्रतिकूलताओं में भी अवसर खोज लेने को ही सकारात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है। जीवन का ऐसा कोई दुःख नहीं, जिसमें डूब कर हरिकृपा से मिले जीवन को नकारात्मकता में धकेला जाए। जिन्दगी की ऐसी कोई बाधा नहीं जिससे कुछ प्रेरणा ना ली जा सके। उसमें सुख की परछाई ना खोजी जा सकें। उन्होंने कहा कि रास्ते में पड़े हुए पत्थर को मार्ग की बाधा भी मान सकते हैं और चाहें तो उस पत्थर को सीढ़ी बनाकर ऊपर भी चढ़ा सकता है। जीवन का आनन्द वही लोग उठा पाते हैं जिनके सोचने का ढंग सकारात्मक होता है। उन्होंने कहा कि इस दुनिया में बहुत लोग इसलिए दुखी नहीं कि उन्हें किसी चीज की कमीं है अपितु इसलिए दुखी हैं कि उनके सोचने का ढंग नकारात्मक है। इसलिए सकारात्मक सोचो और नजर से सकारात्मक ही देखो। इससे आपको अभाव में भी जीने का आनन्द आ जायेगा। ख़ुशी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कितनी सम्पत्ति है अपितु इस बात पर निर्भर करती है कि आपके पास कितनी समझ है। आचार्य ने जनसमूह को प्ररेणा देते हुए कहा कि दया को धर्म का मूल मानें और जैसे मूल के बिना वृक्ष टिक नहीं सकता। वह फल-फूल नहीं दे सकता, उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वैसे ही दया के अभाव में धर्म नहीं हो सकता और धर्म बढ़ भी नहीं सकता। उन्होंने कहा कि दयाहीन व्यक्ति धार्मिक तो क्या मानव कहलाने के लायक भी नहीं होता। कथा में सांवतसर सहित आस-पास के गांवो से श्रद्धालु उमड़ रहें है। कथा 15 फरवरी को प्रारंभ हुई व 21 फरवरी को पूर्ण होगी। 20 फरवरी को कथा पूर्ण होगी और 21 फरवरी को हवन व पाहल के साथ पूरे गांव के महाप्रसाद के साथ कथा पूर्ण होगी।
आचार्य ने विश्नोई समाज को किया एकजुट, गांव में प्रतिवर्ष करते है कथा।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। आचार्य डॉ गोवर्धनराम 1992 से प्रतिवर्ष गांव सांवतसर में जाम्भाणी हरि कथा का वाचन करते है। ग्रामीणों ने बताया कि विश्नोई समाज की पाहल परंपरा 1992 से पूर्व गांव में करीब 21 स्थानों पर निभाई जाती थी। वहीं आचार्य जब गांव में आए तो पूरे विश्नोई समाज को एकजुट होने का संदेश देते हुए एक ही स्थान पर पाहल परंपरा का निर्वहन करने की प्रेरणा दी। आचार्य की समझाईश पर अलग अलग धड़ों ने उनके आग्रह को माना और तभी से प्रतिवर्ष गांव में जांभाणी हरि कथा के भव्य आयोजन के साथ महाराज कथा करते है और पूरा गांव एक साथ पाहल परंपरा में भाग लेता है।




