May 20, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 21 सितंबर 2021। साहित्य को समाज, व्यवस्था, व्यक्ति में परिवर्तन का माध्यम आदिकाल से माना जा रहा है। पहले परिवर्तन का काम ऋषि करते थे और बाद में साहित्यकार। बड़ी बात ये है कि साहित्य परिवर्तन का अहिंसक माध्यम है। अहिंसा शब्द देन ही ऋषियों की है जिसे बाद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जन आंदोलन का हथियार बनाया। साहित्य सदा हिंसा, आतंक के खिलाफ रहा है, इसीलिए अहिंसा उसकी मूल वृत्ति है। इतिहास इस बात की पुष्टि करता है।
साहित्य विस्तार भी अपनी मातृ भाषा से पाता है, क्योंकि उसी में वो हर व्यक्ति तक आसानी से पहुंचता है। हर आदमी की अपनी एक भाषा होती है, चाहे वो साक्षर हो या अनपढ़। उसकी भाषा जरूर होती है। जिसे वो बोलता है, सुनता है और अपनी अभिव्यक्ति देता है। ये भाषा उसे जन्म के साथ मां से मिलती है इसीलिए मातृ भाषा को मायड़ भाषा भी कहा जाता है। यही भाषा सभ्य समाज की संस्कृति को गढ़ती है और उसे पीढ़ियों तक हस्तांतरित कर रक्षा करती है। गांधी ने भी आजादी के आंदोलन के समय यही कहा था।
किसी भी देश, समाज या व्यक्ति को पूरा बदलना तभी सम्भव होता है जब उससे उससे उसकी भाषा और संस्कृति छीन ली जाये। अंग्रेजों ने भी गुलामी के समय देश में यही करने का प्रयास किया था और गांधी ने उसकी खिलाफत की थी।
नये युग में साम्राज्यवादी नीति यही तो है। बाहरी संस्कृति और भाषा को लादकर उस देश के व्यक्ति को बाजारवाद का हिस्सा बनाने के प्रयास हो रहे हैं। उसके कारण आतंकवाद का विद्रूप चेहरा सामने आ रहा है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब हिंसा बढ़ी है, राजनीति संकट में आई है तब तब साहित्य ने ही अहिंसक तरीके से व्यक्ति, समाज और देश को बचाया है। आज फिर से भाषा और संस्कृति के सामने संकट है। साहित्यकार इसे पहचान रहा है और चिंतित होकर प्रयास भी कर रहा है। उसके प्रयास कारगर होने की रफ्तार बहुत धीमी है, क्योंकि नई पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से लगभग कटी हुई दिख रही है। इस हालत ने साहित्य की मुश्किल बढ़ाई है। मोटे अनुमान के अनुसार देश की लगभग 100 भाषाएं तो विलुप्त प्रायः हो गई है। जिनका महत्त्व बोली कहकर कम करने की कोशिश हो रही है। उन बोलियों यानी भाषाओं के साथ वो संस्कृति भी अब तो खत्म सी हो रही है। नहीं तो भाषा और संस्कृति एक कंठ से दूसरे कंठ तक हस्तांतरित होने की हमारे देश में परंपरा थी। तभी तो देश की हर भाषा में बात साहित्य खास महत्त्व रखता है। राजस्थानी भाषा का तो बात साहित्य देश में सबसे अधिक धनवान माना जाता रहा है। 12 करोड़ लोगों की ये भाषा भी संवैधानिक मान्यता न मिलने से संकट में है। राज्य भी इसे दूसरी राज भाषा न बनाकर बड़ी भूल कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक सर्वे में कहा था कि बच्चा अपनी मातृ भाषा में पढ़ता है तो बहुत सफल रहता है। अनेक वैज्ञानिक इस बात का सबूत है। इसलिए प्राथमिक शिक्षा से ही बच्चे को मातृ भाषा में पढ़ाया जाना चाहिए। मगर राजस्थान में ये नहीं हो रहा। उसी के कारण यहां की भाषा और संस्कृति के सामने संकट खड़ा हुआ है जो मूल रूप से समाज और व्यक्ति का संकट है।
अब भी समय है जागने का। राजस्थानी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए इसे मान्यता दी जानी चाहिए। दूसरी राज भाषा बनाना चाहिए। नहीं तो हम अपनी पहचान खो देंगे। ये भाषा बचाना किसी दूसरी भाषा का विरोध नहीं है, समर्थन है। खुद की भाषा बचेगी तभी व्यक्ति दूसरी भाषाओं का सम्मान करेगा। हिंदी देश की संपर्क भाषा बने, इस बात को सभी राजस्थानी मानते हैं। मगर ये तभी सम्भव होगा जब राजस्थानी भाषा भी बचेगी। भाषाएं राजनीतिक दलों की तरह एक दूसरे की विरोधी नहीं होती, सहयोगी होती है। इसी चिंता के कारण देश की 24 भाषाओं के साहित्यकारों को सम्मानित करते हुए प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि मातृ भाषाओं को बचाना आज की पहली जरूरत है। यदि इनको नहीं बचाया गया तो लेखक को पढ़ा ही नहीं जायेगा। सटीक बात है, जिस पर गहन चिंतन जरूरी है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार