






एक सप्ताह से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में भीतर ही भीतर काफी उथल पुथल चल रही है। अनेक जमे हुए नेताओं की नींद उड़ी है तो कईयों को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताने लगी है। राजस्थान के मुख्यमंत्री और पार्टी के कद्दावर नेता अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बयानों ने राजस्थान ही नहीं पूरी कांग्रेस में हलचल मचा दी है। सुर्खियों का ये आलम है कि अभी चर्चा में भाजपा, आप के बजाय कांग्रेस अधिक है। मीडिया में भी इसी पार्टी की खबरें अधिक है। राजनीतिक विश्लेषक भी कांग्रेस में चल रहे घटनाक्रम पर ही ज्यादा बात कर रहे हैं।
इन सब के केंद्र में कांग्रेस में हुई पीके की एंट्री। पीके ने कांग्रेस को 370 का टारगेट दिया और कमान युवाओं के हाथ में देने की बात कही। स्लाइड से पीके ने अपनी रणनीति को प्रजेंट किया। ये प्रजेंटेशन सभी प्रमुख नेताओं को दिखाया गया। उस पर समीक्षा और रणनीति बनाने के लिए सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं की एक कमेटी भी बना दी जो अपनी राय देगी।
उसी प्रक्रिया में सोनिया ने अशोक गहलोत से लंबी बात की। पीके की योजना पर बात हुई। दोनों के मध्य क्या बात हुई, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई मगर राजनीतिक अफवाहों को जरूर हवा मिली। इन अफवाहों में तेजी तब आयी जब सोनिया ने गहलोत की तरह ही सचिन पायलट से भी इस मसले पर अकेले में लंबी मन्त्रणा की। कांग्रेस फिलहाल अपने दम पर केवल राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही शासन कर रही है इसलिए गहलोत – सचिन की मुलाक़ात को गंभीरता से लिया गया।
मुलाक़ात के बाद गहलोत ने मीडिया में जो बयान दिया उससे सुगबुगाहट शुरू हुई। उनकी पीके पर कही बात ने कई सवाल खड़े किए तो साथ ही अनेक आशंकाओं को जन्म दे दिया। इनको हवा मिली सचिन के बयान से। सचिन ने मीडिया को एक सवाल के जवाब में यहां तक कह दिया कि बदलाव, परिवर्तन आदि पर भी चर्चा हुई है। बस, फिर क्या था। राजनीति अपने स्वभाव के अनुसार गर्म हो गई। इस बयान के कई अर्थ निकाले गये। क्योंकि गहलोत और सचिन के बीच काफी समय से टकराहट है और नेतृत्त्व को लेकर भी खींचतान चल रही है, जो जग जाहिर है। सरकार को बाड़ेबंदी में भी जाना पड़ा। मगर भीतर की खटास अब तक जिंदा है, ये भी स्पष्ट है।
हवा में नेतृत्त्व परिवर्तन को लेकर एक बहस ने जन्म ले लिया। सचिन तो उसके बाद चुप हो गए मगर मीडिया और दोनों नेताओं के समर्थकों के मध्य एक बहस चल पड़ी। जो धीरे धीरे आम लोगों की बहस का भी विषय बन गयी। सचिन और गहलोत से इस मसले पर मीडिया ने सवाल करने आरम्भ कर दिए। देश का मीडिया भी इस टकराहट को सुर्खियों में ले आया।
हारकर गहलोत को बयान देना पड़ा। उनके पहले बयान को अलग तरीके से लिया गया। गहलोत ने अपने बयान में कहा कि उनका इस्तीफा को सदा सोनिया गांधी के पास रहता है। ये बयान हवा में उछला, कईयों ने तो भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी। इस मसले पर सचिन की चुप्पी ने सस्पेंस को ज्यादा बढ़ाया।
मामला बिगड़ता देख कल गहलोत को इस मसले पर गम्भीर बयान देना पड़ा। उन्होंने कहा कि नेतृत्त्व बदलने की बातें इस तरह नहीं होनी चाहिए, इससे शासन कमजोर होता है और नुकसान उठाना पड़ता है। उनकी बात गम्भीर है, ब्यूरोक्रेसी पर इस तरह की बातें प्रतिकूल प्रभाव डालती है। जबकि ये मसला पार्टी के भीतर का है और पार्टी के निर्णय इस तरह से पहले खुले में नहीं उछाले जाते। अर्से बाद गहलोत ने पार्टी को लेकर एक गम्भीर मैसेज दिया है, जो पार्टी हित में है। नेतृत्त्व परिवर्तन की सार्वजनिक बातों से कांग्रेस पंजाब में नुकसान उठा चुकी है। गहलोत की बात सही है, यूं निर्णयों पर बातें सही नहीं। पार्टी हित में नहीं। गहलोत के बयान ने गम्भीरता दी है पार्टी को।
पीके का फार्मूला जमीन पर अब उतरने को तैयार है। उन्हें एक धड़ा पार्टी में शामिल करने के पक्ष में है तथा उन्हें गठबंधन का बड़ा काम देना चाहता है। इन सब घटनाओं से स्पष्ट है कि कांग्रेस अपनी सूरत बदलने की कोशिश में है, जिसका असर अगले लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा, ये तो तय है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



