






पेट्रोल – डीजल के बढ़ते दाम अब आम आदमी पर भारी पड़ रहे हैं और महंगाई का आधार बन रहे हैं। इनके दाम हर आम जरूरत की चीजों के दाम बढ़ा रहे हैं, जाहिर है जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा है। इस मसले पर अब तक तो मौन था मगर कल की पीएम और सभी सीएम की वर्चुअल बैठक ने पेट्रोल डीजल के दामों पर एक नई बहस शुरू कर दी है। पीएम ने कल की बैठक में राज्यों से सीधे सीधे वैट कम करने की बात कही। उन्होंने ये भी कहा कि ये दोनों पेट्रोलियम पदार्थ कमाई के साधन नहीं बनने चाहिए। उनका कहना था कि केंद्र ने वैट पिछले साल नवंबर में घटा दिया मगर कई राज्यों ने इसे आज तक नहीं घटाया।
पीएम के वैट घटाने की इस अपील के बाद से ही देश में एक बार फिर पेट्रोल डीजल पर राजनीति शुरू हो गई। गैर भाजपा सीएम जो हैं, उनका अलग राग सामने आया। क्योंकि पीएम में उन राज्यों के नाम भी लिए जहां पेट्रोल व डीजल वैट न घटाने के कारण महंगा है। मुंबई, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता में दाम इसी कारण आगे है। कुल मिलाकर पेट्रोल और डीजल के दाम हर राज्य में अलग अलग है जो एक बड़ी असमानता को दर्शाते हैं।
आम आदमी इस बात से चकित है कि एक देश है मगर हर राज्य में पेट्रोल और डीजल के दाम अलग अलग है। एक देश, दाम अलग। ये गणित आम आदमी समझ ही नहीं पा रहा। मोटे तौर पर पेट्रोल और डीजल सरकारों की कमाई के साधन बन गए हैं और इसी वजह से जनता को राहत नहीं मिल रही। केंद्र एक्साइज ड्यूटी भले घटा दे मगर जब तक राज्य वैट नहीं घटाते तब तक दाम तो नहीं घट सकते।
देश में खाद्य पदार्थ एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का माध्यम ये ही पेट्रोलियम पदार्थ है। इनके दाम के अनुपात में गेंहू, दालें, खाद्य तेल और यहां तक कि सब्जियों के दाम भी 6 महीने में खूब बढ़े हैं। जिसका भार आम आदमी पर पड़ा है। हर घर का बजट पेट्रोल और डीजल के दामों ने बिगाड़ दिया है।
पीएम के साथ वर्चुअल बैठक समाप्त होते ही पेट्रोल और डीजल पर राजनीति शुरू हो गयी। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने तो खुल के इन चीजों के दाम अधिक होने के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेवार बता दिया। इनका कहना था कि केंद्र एक्साइज ड्यूटी घटाए और राज्यों का हिस्सा उन्हें दे।
आर्थिक जानकर तो 6 महीने पहले से ही ये आशंका जताने लगे थे कि आने वाले समय में पेट्रोल व डीजल ज्यादा महंगा होगा। इसके निदान के लिए उनका सुझाव था कि पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में कर दिया जाये। मगर इस बात पर तो न केंद्र सहमत दिखा और न राज्य। अपनी आमदनी को इस निर्णय से वे खोना नहीं चाहते। आमदनी केंद्र में है, जनता की परेशानी नहीं।
एक बार फिर ये मांग उठने लगी है कि इनको जीएसटी के दायरे में कर दिया जाये ताकि निजी कम्पनियां मनमर्जी से दाम न बढ़ा सकें। एक देश, एक दाम का सिद्धांत ही राहत दे सकता है। जीएसटी का भी तो यही ध्येय है, एक देश, एक टैक्स। राजनीति को दरकिनार कर पेट्रोल डीजल जीएसटी के दायरे में लाने की बात पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को सहमत होना चाहिए ताकि आम जनता को राहत मिले। पीएम की कल की बैठक के बाद पेट्रोल डीजल पर राजनीति तो शुरू हो गई मगर ठोस आर्थिक निर्णय पर कोई बात नहीं हुई। जरूरत जनता को राहत देने की प्रमुख होनी चाहिए, ये आम आदमी की मंशा है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



