






यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधान सभा चुनावों में इस बार सोशल मीडिया ही प्रचार का माध्यम रहेगा, जिस पर हर राजनीतिक दल समय समय पर सवाल खड़े करता रहा है। अनेक अखबारों, टीवी चैनल्स को इसी वजह से फेक न्यूज के नाम से पड़ताल करनी पड़ी है। इसी कारण इस बार के चुनाव प्रचार की विश्वसनीयता पर समझदार लोग सवाल खड़े कर रहे हैं।
भाजपा सहित सभी दलों ने यूं तो अपने अपने आईटी सेल गठित कर रखे हैं, मगर उनकी सामग्री पर सवाल भी उठते रहे हैं। भाजपा आईटी सेल को सबसे मजबूत और बड़ा माना जाता है। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सअप ग्रुप आदि के जरिये भाजपा तो पहले से एक बड़ा वर्ग अपने से जोड़े हुए है। इस पार्टी के नेताओं के भी अपने अपने एकाउंट बने है। उसके बाद ये माध्यम आम आदमी पार्टी ने अंगीकार किया।
भाजपा के आईटी सेल की सक्रियता के कारण ही कांग्रेस सहित अन्य दलों को मजबूरी में सोशल मीडिया पर सक्रिय होना पड़ा। इसी कारण इस मंच पर वे भाजपा से कमजोर दिखते हैं।
मगर सबसे बड़ा सवाल है विश्वसनीयता का। फेक प्रचार को रोकेगा कौन, उस पर निगाह रखना कैसे संभव होगा ? चुनाव आयोग ये काम कर लेगा, इस पर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। जो सोशल मीडिया के संचालक हैं वे कार्यवाही करेंगे तब तक फेक समाचार अपना चुनावी काम कर चुका होगा या चुनाव पूरे हो चुके होंगे।
पिछले कई वर्षों से सब जानते हैं कि झूठी खबर फैलाने में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। इस सूरत में पांच राज्यों का मतदाता सोशल मीडिया के प्रचार पर कैसे भरोसा करेगा। जिसकी मार सच्चे प्रचार पर भी पड़ेगी। हालांकि कोविड की तीसरी लहर के बीच वर्चुअल प्रचार ही एकमात्र माध्यम बचा है मगर क्या पार्टी कार्यकर्ता नैतिक बनकर प्रचार करने का दायित्त्व निभायेगा, इसकी गारंटी तो कोई राजनीतिक दल नहीं दे सकता। समझदारी तो मतदाता को ही दिखानी होगी। उसे अधिक सतर्क रहकर अपना निर्णय करना पड़ेगा।
इस पूरे अविश्वसनीय तरीके में एक सकारात्मक उम्मीद भी दिखती है। यदि ये ही प्रचार माध्यम बन जायेगा तो रैली, सभा आदि में होने वाला बड़ा खर्च रुक जायेगा। मतदाता ज्यादा जागरूक और सतर्क हो जायेगा, यदि ऐसा हो जाता है तो बड़ा फायदा होगा। इस बार की चुनाव प्रचार की पद्धति भारतीय लोकतंत्र के लिए नया अनुभव है, जो नई राह बनाने के काम आ सकती है। मगर सब कुछ मतदाता की जागरूकता और राजनीतिक कार्यकर्ता की नैतिकता पर निर्भर करता है। समय इन सब सवालों का जवाब देगा, जिसका इंतजार राजनीतिक विश्लेषक आतुरता से कर रहे हैं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



