






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 10 नवम्बर 2023। विधानसभा चुनाव- 2023 के लिए मतदान 25 नवम्बर को होना है एवं मतदान के लिए आज से 14 दिन शेष रहें है। ऐसे में श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स द्वारा प्रतिदिन विशेष कवरेज “सत्ता का संग्राम” टाइम्स के सभी पाठकों के लिए चुनाव की काऊंडाउन के साथ लगातार प्रस्तुत की जा रही है। प्रतिदिन शाम को एक अंदरखाने की खबर के साथ क्षेत्र की चुनावी चर्चा पाठकों के समक्ष रखी जा रही है। इसी क्रम में पढ़ें आज की विशेष टिप्पणी।
मूंछ की लड़ाई है रे भाई, किसने इस पर पार पाई।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। मूंछों की लडाई तो राजे-रजवाड़ों के समय से चल रही है एवं आज तक इस पर किसने पार पाई है, इतिहास के पन्नों से कही जाने वाली यह बात इन दिनों क्षेत्र में खासी गूंज रही है। यहां संभावित सत्ता के साथ अपना पाला बदलने वाले मूंछ वाले सरदार का नई पार्टी में स्वागत तो उत्साह के साथ किया गया। लेकिन उनके खुद के पैृतक गांव में जब पार्टी प्रचार के लिए पहुंची तो मूंछों की लडाई फिर से सामने आ गई। यहां पार्टी के साथ रहने वाले पुराने सर्मथकों ने जहां सभा स्थल बनाया वहां ये सरदार नहीं पहुंचें। ऐसे में पार्टी भी असमंजस में आ गई एवं डैमेज कंट्रोल का प्रयास कर रही है। लेकिन कहने वाले तो यही कहेगें ना कि “मूंछ की लड़ाई है रे भाई, किसने इस पर पार पाई।“
हमारे हाथ, सबके साथ, प्रत्याशियों की गजब परेशानी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। सरकारों, पार्टियों का नारा “सबका साथ – सबका विकास” तो सभी ने सुना होगा लेकिन इन दिनों श्रीडूंगरगढ़ में अलग ही नारा गूंज रहा “हमारे हाथ-सबके साथ”। ये हाथ यहां आज कल सभी पार्टियों की सभाओं में, सभी की रैलियों में, सभी के कार्यालयों में जिंदाबाद के नारे के साथ दिख रहे है। ऐसे में प्रत्याशियों के सामने भी गजब परेशानी हो गई कि किसे अपना माने एवं किसे पराया। जनता तो जनता कई नेता भी खासे अलबेले मूड़ में है। कई जनप्रतिनिधि तो ऐसे भी दिख रहे है जो खुद पहले दिन माकपा में तो दूसरे दिन कांग्रेस में, दोनों की प्रचार सभाओं में सक्रिय नजर आए। वहीं कई ऐसे जनप्रतिनिधि भी है जो पिता माकपा में तो पुत्र भाजपा में सक्रिय दिख रहे है। इस बार चुनावों में यह गजब परेशानी प्रत्याशियों के सामने आई है एवं प्रत्याशी येन केन प्रकारेण दिल की बात ढूंढने में जुटे हुए है।
यूपीआई का जमाना, अब सब एडवांस में, पुराने ढ़र्रे वालों के चेहरों पर शिकन।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। देश में मोदी सरकार आने के बाद यूपीआई का चलन कुछ ज्यादा ही हो गया है एवं साथ ही जीएसटी सहित कई कानूनों ने देश में उधारी का व्यापार एक हद तक कम कर दिया है। श्रीडूंगरगढ़ के चुनावी बाजार में भी एक नेताजी इन दिनों खासे असहज हो रहे है। उन्हें पैसा खर्च करने का अभ्यास कुछ कम ही है एवं उनकी उधारी की आदत लंबे समय तक चर्चित भी रही है। नेताजी तो इस बार भी मैदान में है लेकिन बाजार का ढर्रा बदल गया है। अब उनके सर्मथक भी उनके कहने पर काम करने को तैयार तो है लेकिन मामला अब एडवांस के आग्रह पर आकर अटक रहा है। अब नए सिस्टम से पुराने ढर्रे वाले नेताजी भी परेशान एवं कार्यकर्ता भी परेशानी में नजर आ रहें है। लेकिन कहें तो किसें कहें कि भाई जमाना बदल रहा है।




