






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 15 नवम्बर 2023। विधानसभा चुनाव- 2023 के लिए मतदान 25 नवम्बर को होना है एवं मतदान के लिए आज से 9 दिन शेष रहें है। ऐसे में श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स द्वारा प्रतिदिन विशेष कवरेज “सत्ता का संग्राम” टाइम्स के सभी पाठकों के लिए चुनाव की काऊंडाउन के साथ लगातार प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रतिदिन शाम को एक अंदरखाने की खबर के साथ क्षेत्र की चुनावी चर्चा पाठकों के समक्ष रखी जा रही है। इसी क्रम में पढ़ें आज की विशेष टिप्पणी।
हम तो श्रोता है, कोई सुना दो।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। चुनावों में सामान्यतया: देखा जाता है कि जनता श्रोता कम और अपने अपने नेताओं के प्रतिनिधि के रूप में वक्ता ज्यादा बनी रहती है लेकिन इन दिनों श्रीडूंगरगढ़ की जनता का मूड बड़ा ही श्रोता टाईप का बना हुआ है। और यही मूड क्षेत्र के नेताओं की परेशानी बन रहा है। हालत यह है कि गांवों में कोई भी प्रत्याशी चला जाए सबके लिए एक समान भावों से, एक ही जगह पर दरियां बिछी हुई है। गांवों में ये हो रहा है कि जैसे ही गांव में आने वाले नेता बदले वैसे ही सभा स्थल का झंडा बदला, बाकी श्रोता पहले से तैयार एवं सभा शुरू। ऐसे में बुधवार को क्षेत्र के एक गांव में मजेदार स्थिति हो गई जब एक ही गांव में दो प्रत्याशियों की सभाएं होनी थी। हुआ कुछ यूं कि बीदासर तहसील के सीमावर्ती गांव में किसान हितों को बुलंद करने वाली पार्टी की सभा 2.30 बजे होनी थी एवं उसी गांव में निर्दलीय प्रत्याशी की सभा 3.30 बजे होनी थी। घटनाक्रम के अनुसार पहले आना था वह तो आधा घंटा लेट हो गए एवं जिन्हें बाद में आना था वे आधा घंटा पहले आ गए। ऐसे में दोनो ही लगभग एक ही समय पहुंचें तो मौके पर मजेदार स्थिति हो गई। लेकिन जो जनता एकत्र थी उनके तो एक ही शब्द थे कि हम तो श्रोता है सुनना है कोई भाषण सुना दो।
बैलेट पेपर भी बना बैरी, बढ़ गई प्रचार की सरदर्दी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। क्षेत्र में छह से ज्यादा विधानसभा चुनावों का अनुभव ले चुके बड़े नेताजी की समस्यांए कम होने का नाम नहीं ले रही। पहले तो टिकट पर सकंट, फिर टिकट में देरी और फिर टिकट आई तो ऐसे कि नामांकन पहले ही अकेले जाकर करना पड़ा। लेकिन फिर भी इन दिक्कतों को पार कर चुनाव मैदान में पूरे लाव लश्कर के साथ उतरे बड़े नेताजी ने इन समस्याओं पर तो पार पा लिया। लेकिन एक नकारात्मक प्रचार बैलेट पेपर से हो रहा है, लोग मजे मजे में यही चर्चाएं कर रहे है कि बैलेट पेपर में संदेश छिपा हुआ है। अब यह संदेश कौन समझे या कौन नहीं समझे यह तो मुद्दा दूर का है लेकिन नेताजी के सामने इस चर्चा से निपटने के लिए आक्रामक प्रचार की सरदर्दी ओर अधिक बढ़ गई है। दिक्कत यह है कि इस समस्या पर पार पाना भी नेताजी के हाथ में नहीं है। ऐसे में आक्रामक प्रचार ही एकमात्र रास्ता बचा है।
अलबेले बाजार में अलबेले भाव, चश्मेधारियों पर टिका व्यापार।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। चुनावों के दौरान चर्चाओं एवं सौदों के बाजार बड़े ही अलबेले होते है लेकिन इस बार इस बाजार के भाव भी बड़े अलबेले है। यहां के सट्टेबाजार में तीनों ही मुख्य प्रत्याशियों के भाव ऐसे है कि हर हाल में सौदागर तो मुनाफे में ही रहने वाला है। सुनने में आ रहा है कि इस बार सौदागरों ने बाजार के बजाए चश्मों पर ध्यान केन्द्रित कर लिया है एवं तीनों की पार्टियों के चश्मेधारियों को ढूंढ़ ढूंढ कर भाव दे रहे है। पुराने सौदागरों ने इसे सौदा नहीं ठगविद्या की संज्ञा दी है क्योंकि जब किसी एक प्रत्याशी के भाव रुपए से ऊपर हो तो उसकी हार एवं दूसरे प्रत्याशी जिसके भाव रुपए से कम हो उसकी जीत मानी जाती है। लेकिन श्रीडूंगरगढ़ के इस अलबेले बाजार में तीनों की पार्टियों के भाव एक रुपए से कहीं अधिक है तो आम लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि जब तीनों के ही भाव एक रुपए से अधिक है तो जीत कौन रहा है। खैर जो भी हो चश्मेधारियों के सहारे चल रहे इस प्योर मुनाफे के बाजार को देखते हुए कई नए नए सौदागर भी बाजार में उतर चुके है।



