






संसद के मानसून सत्र से पहले परंपरा के अनुसार इस बार भी कुछ शब्दों की सूची जारी इन शब्दों को असंसदीय बताया गया है। लोकसभा सचिवालय ने इन शब्दों की सूची जारी की है। इसके साथ ही संसद परिसर में प्रदर्शन करने को भी गलत कहा गया है। इन निर्देशों के जारी होते ही सत्ता और विपक्ष के मध्य जुबानी जंग शुरू हो गई है। सत्ता पक्ष इसे 2009 से जारी सहज प्रक्रिया बता रहा है तो विपक्ष इसे लोकतंत्र पर अंकुश का आरोप लगा रहा है। ये मसला काफी गर्मा गया है।
विपक्ष ने लोकसभा सचिवालय के निर्देश जारी होते ही सत्ता पक्ष पर आरोप लगा दिया कि ये लोकतंत्र को समाप्त कर तानाशाही की तरफ जाने का संकेत है। कांग्रेस, आप, टीएमसी, आरजेडी आदि दलों ने विरोध में बयानों की झड़ी लगा दी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर इस विषय को लेकर बहस आरम्भ हो गई। बेहद तीखे बयान विपक्षी नेताओं के थे। जबकि आम आदमी के कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। उसका ये तो मानना था कि सांसदों पर बोलने का प्रतिबंध जायज नहीं।
आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सामने आना पड़ा। उन्होंने कहा कि 2009 से ये हो रहा है, हर सत्र से पहले इस तरह के निर्देश जारी किए जाते हैं। जिनका ध्येय संसद को वाद विवाद से बचाना और चर्चा को गरिमामय बनाना है। लगातार ऐसे निर्देश जारी होते रहे हैं फिर भी सदस्य उन शब्दों को बोलते रहे हैं। जो शब्द असंसदीय शब्दों की श्रेणी में आते हैं, उनको हटाया भी जाता रहा है। बिरला ने कहा कि हर सदस्य का ये दायित्त्व है कि वो अपने आचरण से सदन की गरिमा और मर्यादा को बढ़ाये। बात सही है, सीधे प्रसारण के शुरू होने के बाद ये ज्यादा जरूरी है। अनेक बार सदन की कार्यवाही में होते शोरगुल को जनता भी देखती है। सांसदों की भाषा को भी सुनती है।
बिरला ने कल ये बातें संसद भवन परिसर में आयोजित विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों की बैठक को संबोधित करते हुए कही। राष्ट्रपति और राज्यपाल के अभीभाषणों के समय व्यवधान न डालने का भी उनका आग्रह सांसदों व विधायकों से था। बिना तथ्यों के आरोप लगाने की बात को भी उन्होंने उचित नहीं ठहराया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर तथ्य हो तभी आरोप लगाने चाहिए।
दो दिन से विपक्ष इस बात पर भी नाराजगी जता रहा है कि संसद के बुलेटिन में ये बताया गया है कि संसद में धरने प्रदर्शन नहीं हो सकेंगे। इस आशय का ट्वीट कांग्रेस के राज्य सभा सांसद जयराम रमेश ने किया। उनके सुर में सुर अनेक विपक्षी नेताओं ने मिलाया। बिरला ने उस बैठक में इस तरह के प्रतिबंध को लेकर कोई सर्कुलर जारी होने से इंकार किया। साथ ही ये भी कहा कि सभी राजनीतिक दलों को इन संस्थाओं को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए।
यदि लोकसभा अध्यक्ष ये कहते हैं तो बात गम्भीर है, सभी दलों के सहयोग से सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। संसद के अधिकतम समय का उपयोग होना चाहिए ताकि जन समस्यों को उठाया जा सके। संसद में किसी समस्या का आना, उस समस्या पर ध्यान केंद्रित होना होता है। बहरहाल, इस विवाद का सच तो सत्र के समय सामने आ जायेगा। मगर सत्ता और विपक्ष को संसद, विधानसभाओं की गरिमा बनाये रखने के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए, तभी तो हम कह सकेंगे कि भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और स्वस्थ लोकतंत्र है। एक सत्र संसद का इस विषय पर भी हो और बिना राजनीतिक हित के उसमें सरसम्मति के निर्णय हो। ये ही हर राज्य की विधानसभा में भी हो। संविधान के जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र की रक्षा और मजबूती सत्ता और विपक्ष के सामंजस्य से ही सम्भव है। दोनों को दलीय हितों से ऊपर उठकर जन हित और लोकतंत्र हित में निर्णय करने चाहिए। बहरहाल, इस विवाद ने एक गम्भीर विषय पर राजनीतिक दलों, नेताओं के साथ जनता का भी ध्यान खिंचा है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार




