May 21, 2026
26jan

लोकतंत्र में वोट पाना जब राजनीतिक दलों का पहला लक्ष्य बन जाता है, तब अर्थ व्यवस्था पर मार पड़ती है। बिगड़ी अर्थ व्यवस्था की मार अपरोक्ष रूप से आम आदमी पर ही पड़ती है। फ्री पाने की फिराक के दूरगामी बुरे परिणाम पर उसकी नजर भी नहीं जाती। जब नजर जाती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। पडौसी देश श्रीलंका इसका जीता जागता उदाहरण है।
आंकड़े बहुत ही डरावने है। श्रीलंका सहित दुनिया के 69 देश आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। क्योंकि कि जब आमदनी से खर्च दुगना हो जाता है तो अर्थ व्यवस्था में बिखराव स्वाभाविक है। विश्व बैंक भी इस मामले में कई बार चेतावनी दे चुका है, क्योंकि कई देश कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं।
भारत में भी अब फ्री का फार्मूला अपनाकर वोट पाने की रीत चलने लगी है, जिसने आर्थिक विश्लेषकों को चिंता में डाल दिया है। राज्यों के चुनाव के समय जिस तरह से लोक लुभावन वादे करके वोट लेने की कोशिश एक बडी समस्या बन गयी है। बिजली फ्री का वादा तो बहुत विकट स्थिति में पहुंच गया है। बिजली न केवल महंगी हो गई है अपितु उसका संकट भी खड़ा हो गया है। देश के 14 राज्य बिजली संकट से गुजर रहे हैं, ये चिंता की बात है।
इसी तर्ज पर कर्ज माफी को देखना चाहिए। जरूरतमंद की मदद गलत नहीं मगर हर कर्ज की माफी के वादे का असर अंतोतगत्वा अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। फ्री में उपकरण बांटने के चुनावी वादों को पूरा करने में राज्य कर्ज के बोझ में दब जाते हैं और उनके विकास की गति रुक जाती है। जाहिर है, वादों की पूर्ति के लिए उनको कर्ज लेना पड़ता है और बाद में इसका दुष्परिणाम उसी आम आदमी को भुगतना पड़ता है जिसने लाभ लिया है। विकास से पूरे राज्य को महरूम रहना पड़ता है।
जरूरतमंद का हाथ थामकर उसकी मदद करना लोक कल्याणकारी राज्य का दायित्त्व है, मगर उसमें भी प्राथमिकता तय होना जरूरी है। समान रूप से लाभ सबमें बांटना जरूरतमंद की मदद तो नहीं माना जा सकता।
राज्य यदि अपने लोगों को मदद देनी है और कुछ चीजें फ्री देनी है तो उसे कर्ज का सहारा लेने की बजाय अपनी आमदनी को बढ़ाना चाहिए। राज्य खुद की आमदनी करे और अपने लोगों को लाभ दे, ये आदर्श स्थिति होती है। मगर आमदनी के मामले में बेहतर स्थिति नहीं है अधिकतर राज्यों की।
अर्थ के मामलों में वोट का दखल अर्थ व्यवस्था को प्रभावित करता है। इस मामले में सभी राज्य सरकारों का धर्म है कि अर्थ विशेषज्ञों की राय को ही तरजीह दे। वोट पाने के दूसरे तरीके भी है, पहले भी तो पार्टियों को वोट मिलते ही थे। अर्थ व्यवस्था के मसले पर सभी राजनीतिक दलों को अपने दलीय हित से ऊपर उठकर राष्ट्र हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। गरीब, जरूरतमंद की मदद ध्येय हो, वोट ध्येय न हो। अब समय आ गया जब अर्थ नीति के मामले में गम्भीर चिंतन और ठोस निर्णय की जरूरत है। ये समय की मांग है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार