May 21, 2026
26jan

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 8 जुलाई 2022। पिछले आठ साल से भारतीय लोकतंत्र में सर्वाधिक नुकसान विपक्ष को हुआ है और उसका असर जन आंदोलनों पर पड़ा है। जो अंततः लोकतंत्र का ही नुकसान करता है, जो चिंता की बात है। हर सत्ता अपने सामने मजबूत विपक्ष की अपेक्षा रखती है ताकि उसे अपनी कमियों का भी पता चलता रहे। मगर आठ साल से विपक्ष नदारद सा दिखता है और सत्ता भी विपक्ष को मजबूत होने नहीं दे रही, ये लोकतंत्र का बड़ा सत्य है। जिसे नजरअंदाज करने से ही आम आदमी को महंगाई, बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है।
वर्तमान केंद्र सरकार ने आठ साल के अपने कार्यकाल में अनेक वर्षों से लंबित मामलों पर निर्णय लिए, मगर विपक्ष उनमें अपनी भूमिका नहीं निभा सका। धारा 370 का हटना, राम मंदिर आदि मुद्दों पर देश के मूड को भांपने में विपक्ष कमजोर रहा, इसी कारण वो ठोस भूमिका नहीं निभा सका। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष होना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है ये देखना कि सरकार के किस निर्णय का विरोध किया जाये, किस पर समर्थन किया जाये और किस निर्णय पर चुप रहा जाये। विपक्ष होने के कारण सरकार के हर निर्णय का विरोध तो विपक्ष नहीं, जनता साथ नहीं देती।
किसान आंदोलन से विपक्ष को सीख लेनी चाहिए। लोकतंत्र में ये बड़ा आंदोलन था और सरकार को भी अंततः अपने किसान बिल वापस लेने पड़े। जब आंदोलन का एक रुख होता है तो हर सरकार को यू टर्न भी करना पड़ता है, जो पराजय नहीं सूझबूझ है। इसी तरह की सूझ की अपेक्षा लोकतंत्र व जनता विपक्ष से भी करती है।
विपक्ष चूंकि एक दशक से अप्रासंगिक हो गया इसलिए उसके सही विरोध को भी जनता का साथ नहीं मिल रहा। ऐसा नहीं है कि विपक्ष ने सही मसले पर जन आंदोलन न किये हों। किये हैं, मगर सत्ता ने उस समय विपक्ष को ही छिन्न भिन्न किया। ये सत्ता का भी लोकतंत्र के लिए सही कदम नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र के लिए आये संक्रमण काल के लिए सत्ता और विपक्ष, दोनों जिम्मेवार है। कुछ खामियों के कारण ही ये स्थिति बनी है। चिंता इस बात की है कि इन खामियों को कोई भी दूर करना नहीं चाहता। सत्ता तो से ही दलों के पास रही है।
देश की जनता ने महाराष्ट्र का ताजा पॉलिटिकल घटनाक्रम देखा है। किस तरह बड़े पैमाने पर दलबदल ने सत्ता को बदला। दलीय गणित लोकतंत्र से बड़ी हो गई। सत्ता के लिए इस तरह के दलबदल अंतोतगत्वा लोकतंत्र का नुकसान है। इससे पहले गोवा में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिसके पास बहुमत नहीं उसने सत्ता बनाई और जो बड़ा दल था उसी के विधायकों ने दलबदल किया, लोकतंत्र इन दलबदलुओं को देखता भर रहा।
फिर तो ये सिलसिला सा चल पड़ा। कर्नाटक, मध्यप्रदेश इसके बड़े उदाहरण है। एक दल से चुनाव जीता, मंत्री बने। बिना कारण विधायकी छोड़ी और सरकार गिराई। दूसरे दल में जाकर उप चुनाव लड़ा और मंत्री बने, उनका दर्जा वही रहा, बस सरकार का दल बदल गया। ये लोकतंत्र के लिए विस्मित करने वाली घटनाएं है। जिनके कारण ही विपक्ष अप्रासंगिक होता जा रहा है। विपक्ष अकेला इसके लिए जिम्मेवार नहीं, सत्ता उससे ज्यादा जिम्मेवार है। अब तो स्थिति विकट है, ये सभी राजनीतिक दलों को समझना चाहिए। केवल दलीय हित नहीं, लोकतंत्र के बारे में भी सोचना चाहिए। ज्यादा जिम्मेवारी सत्ता की है तो विपक्ष को भी अपनी नीति में बदलाव करना चाहिए। तभी जन आंदोलनों की जरूरत महसूस होगी, जो सत्ता और विपक्ष, दोनों को फायदा देगी। अंततः इससे लोकतंत्र व आम आदमी का भला होगा।
मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार