






दो साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कांग्रेस आलाकमान राजस्थान कांग्रेस के संकट का हल नहीं निकाल सका है। पूर्वी राजस्थान के कद्दावर नेता व पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट अब भी कांग्रेस आलाकमान के लिए एक अबूझ पहेली बने हुए हैं। पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के कार्यकाल में उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए जो आरोप लगाये थे, उनकी जांच कराने की मांग को लेकर अपनी ही सरकार होने के बाद भी उन्होंने एक दिन का सत्याग्रह किया। जिस पर राजस्थान से लेकर दिल्ली तक की कांग्रेस हिल गई। पिछले सितंबर में जब गहलोत समर्थक विधायकों, मंत्रियों ने विधायक दल की बैठक का बहिष्कार कर अपने इस्तीफे दिए थे। कांग्रेस के इतिहास में पहली बार आलाकमान के भेजे पर्यवेक्षकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। मंत्रियों शांति धारीवाल व महेश जोशी ने खुलकर पार्टी से अलग स्टैंड लिया और गहलोत का समर्थन किया। उस समय एक पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे भी थे जो आज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। मगर वे भी उन मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं कर सके जिनको अनुशासन हीनता के नोटिस दिए गये थे। दो दिन में निर्णय का बयान के सी वेणुगोपाल ने दिया, अभी तक वे दिन पूरे ही नहीं हुए हैं। हुआ उल्टा, उस समय के पर्यवेक्षक अजय माकन को जरूर राज्य के प्रभारी से हटना पड़ा।
फिर वही कहानी दोहराई जा रही है। इस बार पायलट के सत्याग्रह पर भी प्रभारी रंधावा ने कार्यवाही, अनुशासन हीनता की बातें एक दिन तो दी, मगर दूसरे दिन उनके सुर भी नरम पड़ गए। खड़गे व राहुल से बात के बाद गर्म मामले पर रंधावा ने पानी के छींटे डाले। दूसरी तरफ आज से पायलट अपने बूते पर जनता के बीच उतर रहे हैं।
आलाकमान के लिए सचिन पायलट इसी का अजुब पहेली बन गए हैं। अब आलाकमान ने वन टू वन बात करेगा। फिर उसकी रिपोर्ट खड़गे व राहुल के पास जायेगी। उसके बाद कुछ होगा, ये पहले के अनुभव से लगता नहीं। इस दौर में सचिन के पक्ष के विधायकों की संख्या अवश्य बढ़ी है। गहलोत उसके बाद भी बड़ी ताकत है, इसमें शक नहीं। भाजपा, हनुमान बेनीवाल भी सचिन को लुभाने में लगे हैं। सचिन इन सब पर मौन है, इसीलिए पहेली बने हैं।
अब राज्य के चुनाव में ज्यादा समय नहीं रहा। पीएम व भाजपा ने अपने दल की विसंगतियों को थामना भी शुरू कर दिया। मगर कांग्रेस अभी तक टकराहट में ही लगी है। चुनाव में यदि सभी नेता एक होकर नहीं लड़े तो गहलोत सरकार की घोषणाओं का लाभ कांग्रेस को नहीं मिल सकेगा। सचिन को आलाकमान कई ऑफर दे रहा है मगर वे बोल ही नहीं रहे। बहरहाल विधायकों से वन टू वन बात के बाद कांग्रेस की गुटीय राजनीति किसी हल तरफ जायेगी। अगर हल नहीं हुआ तो चुनाव पर ये टकराहट भारी पड़ेगी।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



