






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 16 मई 2026। पढें आज का पंचांग, साथ जाने और भी कई खास बातें आचार्य विष्णुदत्त शास्त्री के साथ।
🚩श्री गणेशाय नम:🚩
शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
*करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।
इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।
📜 आज का पंचांग 📜
☀ 16-May-2026
☀ Sri Dungargarh, India
🔅 तिथि अमावस्या 01:33 AM
🔅 नक्षत्र भरणी 05:31 PM
🔅 करण चतुष्पाद, नाग 03:25 PM
🔅 पक्ष कृष्ण
🔅 योग सौभाग्य 10:25 AM
🔅 वार शनिवार
☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ
🔅 सूर्योदय 05:43 AM
🔅 चन्द्रोदय 05:38 AM
🔅 चन्द्र राशि 10:47 PM
🔅 सूर्यास्त 07:16 PM
🔅 चन्द्रास्त 07:00 PM
🔅 ऋतु ग्रीष्म
☀ हिन्दू मास एवं वर्ष
🔅 शक सम्वत 1948 पराभव
🔅 काली सम्वत 5127
🔅 दिन काल 13:33:05
🔅 विक्रम सम्वत 2083
🔅 मास अमांत वैशाख
🔅 मास पूर्णिमांत ज्येष्ठ
☀ शुभ और अशुभ समय
☀ शुभ समय
🔅 अभिजीत 12:03 PM 12:57 PM
☀ अशुभ समय
🔅 दुष्टमुहूर्त 05:43 AM 06:38 AM
🔅 कंटक 12:03 PM 12:57 PM
🔅 यमघण्ट 03:40 PM 04:34 PM
🔅 राहु काल 09:07 AM 10:48 AM
🔅 कुलिक 06:38 AM 07:32 AM
🔅 कालवेला / अर्द्धयाम 01:51 PM 02:45 PM
🔅 यमगण्ड 02:12 PM 03:53 PM
🔅 गुलिक काल 05:43 AM 07:25 AM
☀ दिशा शूल
🔅 दिशा शूल पूर्व
☀ चन्द्रबल और ताराबल
☀ ताराबल
🔅 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद
☀ चन्द्रबल
🔅 मेष, मिथुन, कर्क, तुला, वृश्चिक, कुम्भ
📜 चोघडिया 📜
🔅 काल 05:43 AM – 07:25 AM
🔅 शुभ 07:25 AM – 09:06 AM
🔅 रोग 09:06 AM – 10:48 AM
🔅 उद्वेग 10:48 AM – 12:30 PM
🔅 चल 12:30 PM – 02:12 PM
🔅 लाभ 02:12 PM – 03:53 PM
🔅 अमृत 03:53 PM – 05:35 PM
🔅 काल 05:35 PM – 07:17 PM
🔅 लाभ 07:17 PM – 08:35 PM
🔅 उद्वेग 08:35 PM – 09:53 PM
🔅 शुभ 09:53 PM – 11:12 PM
🔅 अमृत 11:12 PM – 00:30 AM
🔅 चल 00:30 AM – 01:48 AM
🔅 रोग 01:48 AM – 03:06 AM
🔅 काल 03:06 AM – 04:25 AM
🔅 लाभ 04:25 AM – 05:43 AM
📜 लग्न तालिका 📜
🔅 वृषभ स्थिर
शुरू: 05:43 AM समाप्त: 07:39 AM
🔅 मिथुन द्विस्वाभाव
शुरू: 07:39 AM समाप्त: 09:54 AM
🔅 कर्क चर
शुरू: 09:54 AM समाप्त: 12:14 PM
🔅 सिंह स्थिर
शुरू: 12:14 PM समाप्त: 02:31 PM
🔅 कन्या द्विस्वाभाव
शुरू: 02:31 PM समाप्त: 04:48 PM
🔅 तुला चर
शुरू: 04:48 PM समाप्त: 07:07 PM
🔅 वृश्चिक स्थिर
शुरू: 07:07 PM समाप्त: 09:26 PM
🔅 धनु द्विस्वाभाव
शुरू: 09:26 PM समाप्त: 11:30 PM
🔅 मकर चर
शुरू: 11:30 PM समाप्त: 01:13 AM
🔅 कुम्भ स्थिर
शुरू: 01:13 AM समाप्त: 02:41 AM
🔅 मीन द्विस्वाभाव
शुरू: 02:41 AM समाप्त: 04:07 AM
🔅 मेष चर
शुरू: 04:07 AM समाप्त: 05:43 AM
🌼शनि जयंती 🌼
आज ज्येष्ठा माह की अमावस्या और शनि जयंती का दिव्य संयोग है । अमावस्या के स्वामी पितृ देव जी को माना गया है । आज शनि देव जी का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है ।
शास्त्रों के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि में ग्रहो में न्यायाधीश भगवान शनिदेव का जन्म को हुआ था, इसीलिए इस दिन को शनि देव जी का प्राकट्य दिवस / शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है ।
शनि देव न्याय के देवता कहे गए है, शनिदोषो से मुक्ति पाने, शनि देव की कृपा प्राप्त करने के लिए शनि अमावस्या और शनि जयंती का दिन बहुत ही विशेष माना जाता है।
पीपल के पेड़ पर पितरों का वास माना गया है। अमावस्या के दिन सुबह के समय लोहे के बर्तन में, दूध, पानी, काले तिल, शहद एवं जौ मिला कर समस्त सामग्री पीपल की जड़ में अर्पित करके पीपल की 7 परिक्रमा करें, तथा इस दौरान “ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः” मंत्र का जाप भी लगातार करते रहें ।
शनि देव को काला / नीला रंग अति प्रिय है। आज शनि जयंती के दिन सांय काल शनि मंदिर में शनि देव पर तिल का अथवा कड़वा तेल, काला वस्त्र, और सुरमा अवश्य ही चढाएं।
शनिवार के दिन शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं, सांय काल प्रदोष काल में ( 6 बजे से 8 बजे के बीच ) पीपल पर भी दीपक अवश्य ही जलाएं ।
शनि जयंती पर कड़वा तेल ( सरसो का तेल ) काले उड़द, काले तिल, लोहा, गुड़ एवं नीले या काले पुष्पों चढ़ाने से शनि देव प्रसन्न होते है ।
शनि जयंती के दिन कड़वे तेल में अपना चेहरा देखकर उसका दान अर्थात छाया दान करें ।
शनि जयंती के दिन किसी गरीब मजदूर या सफाई कर्मचारियों को कपडे धोने का नीला साबुन और चाय की पत्ती का पैकेट दक्षिणा के साथ दान में दें ।
इस दिन मजदूरों, सफाई कर्मचारियों को समोसे / पकौड़े / नमकीन खिलायें, उन्हें चाय पिलायें तथा बिस्कुट / पाव आदि खाने को दें । उनकी इस तरह से श्रद्धा से खातिर करें जैसा कि आप अपने किसी अभिन्न की करते है । ऐसा करने से शनि देव प्रसन्न होते है जातक को कष्टों से छुटकारा मिलता है ।
शनि की दशा / साढ़े के दुष्प्रभावों को दूर करने, शनि देव को अपने अनुकूल करने के लिए आज दशरथ कृत शनि स्तोत्र, हनुमान चालीसा एवं बजरंग बाण का पाठ अवश्य करें ।
आज पितरों की कृपा प्राप्त करने के लिए घर पर ब्राह्मण को भोजन कराएं एवं उसे यथा शक्ति दान – दक्षिणा प्रदान करें ।
अमावस्या के दिन घी, नमक, चावल, चीनी, आटा, सत्तू, काले तिल, अनाज, वस्त्र, आदि दक्षिणा के साथ योग्य ब्राह्मण को दान में अवश्य ही दें , ऐसा करने से पितरो का आशीर्वाद मिलता है ।
अमावस्या के दिन घर पर खीर अवश्य बनायें फिर उसमें थोड़ी सी खीर दोने पर निकाल कर पित्रों के निमित पीपल पर रख आएं ।
हर अमावस्या को गहरे गड्ढे या कुएं में एक चम्मच दूध डालें इससे कार्यों में बाधाओं का निवारण होता है ।
इसके अतिरिक्त अमावस्या को आजीवन जौ दूध में धोकर बहाएं, आपका भाग्य सदैव आपका साथ देगा ।
अमावस्या पर तुलसी के पत्ते या बिल्व पत्र बिलकुल भी नहीं तोडऩा चाहिए। अमावस्या पर देवी-देवताओं को तुलसी के पत्ते और शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाने के लिए उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।
🌼वट सावित्री व्रत 🌼
आज वट सावित्री ब्रत है, यह ब्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है । हिंदू धर्म में बट सावित्री का ब्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास पर्व माना जाता है ।
इस दिन महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती है । मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति की उम्र लंबी होती है और दांपत्य जीवन सुखमय होता है ।
इस बार शनि जयंती, शनि अमावस्या के साथ बट सावित्री ब्रत पड़ने के कारण इस और भी अधिक महत्व हो गया है ।
शास्त्रों के अनुसार, माता सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से वापस पाया था, तभी से वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व माना गया है ।
इस ब्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र के लिए निर्जल ब्रत रखती है, इस दिन महिलाएं लाल, पीले, गुलाबी आदि वस्त्र पहन कर सोलह श्रंगार करके बट बृक्ष की पूजा करती है ।
इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे बैठकर वट सावित्री व्रत कथा सुनती हैं, बिना इस कथा को सुने व्रत पूरा नहीं माना जाता है । वट सावित्री व्रत के समय सुहागिन महिलाएं पूजा के दौरान बरगद के पेड़ के तने के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटती हैं, इसे पति-पत्नी के सात जन्मों के अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है ।
वट सावित्री ब्रत में सुहागिन महिलाएं माँ गौरी अर्थात पार्वती मैय्या की भी पूर्ण विधि विधान से पूजा करती है
पण्डित विष्णुदत्त शास्त्री



