May 21, 2026
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                                                                                                     श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स।

कानूनी अर्थ में, ‘उद्घोषणा’ शब्द का अर्थ सामान्य शब्दों में आधिकारिक घोषणा नाम से समझ सकते है। यहां, यह किसी व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए बाध्य करने के तरीकों में से एक है।
अधिकांश अपराधी कानून से बचने के लिए अपराध करने के बाद भाग जाते हैं। अगर यह किसी अपराध या गलत काम के लिए खुद को सजा से बचाने का उपाय होता, तो अपराध करना बहुत आम बात हो जाती। हालांकि, कई बार ऐसे मौके आते हैं जब अपराधी और डिफॉल्टर पुलिस या कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं। ऐसा अक्सर इसलिए होता है क्योंकि उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और कई बार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कोर्ट उनके लिए सबसे कीमती चीज हासिल कर लेता है- ‘उनकी संपत्ति’।
आइये जानते है भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिंता में इनसे जुडी कानूनी प्रक्रिया:-
1. फरार व्यक्ति के लिए उदघोषणा:- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 84 के अनुसार जब किसी न्यायालय को यह लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके खिलाफ वारंट जारी किया गया है, वह फरार हो गया है। या अपने आप को छुपा रहा है या ऐसे वारंट का निष्पादन नहीं किया जा सकता है। तब ऐसी स्थिति में न्यायालय द्वारा यह घोषणा प्रकाशित की जाती है कि वह व्यक्ति घोषणा की तारीख के पश्चात कम से कम 30 दिन में हाजिर होगा। वह व्यक्ति जहां मामूली तौर पर निवास करता है वहां ऐसी घोषणा सार्वजनिक रूप से पढ़ी जाएगी। न्यायालय को ठीक लगता है तो ऐसी घोषणा का प्रकाशन समाचार पत्र में भी किया जा सकता है।
2. फरार व्यक्ति की सम्पति की कुर्की:– बीएनएसएस की धारा 85 के अनुसार न्यायालय द्वारा उद्घोषणा करने के बाद फरार व्यक्ति की संपत्ति को कुर्क करने का कार्य किया जा सकता है। लेकिन अगर न्यायालय को यह लगता है कि जिस व्यक्ति के बारे में उद्घोषणा की गई है। वह व्यक्ति अपने संपत्ति को जल्द से जल्द किसी अन्य के नाम कर सकता है या न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से हटा सकता है तो न्यायालय द्वारा उद्घोषणा जारी करने के साथ ही कुर्की का आदेश भी दिया जा सकता है। यदि कुर्क की जाने वाली संपत्ति में पशुधन या खराब होने वाले सामान शामिल हैं, तो न्यायालय संपत्ति की तत्काल बिक्री का निर्देश देते हुए आदेश दे सकता है।
3. कुर्की के बारे में दावे और आपतियां:- बीएन सुरक्षा संहिता की धारा 87 के अनुसार यदि कुर्क की गई संपत्ति के बारे में कुर्की की तारीख से 6 माह के भीतर कोई व्यक्ति ऐसी आपत्ति करेगा कि वह संपत्ति उसकी है ना की उद्घोषित व्यक्ति की तो धारा 85 के अनुसार उस सम्पति की कुर्की नहीं की जा सकती और उस दावे या आपत्ति की जांच के बाद उसे मंजूर या नामांजूर किया जा सकेगा। ऐसी आपत्ति उसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में की जाएगी जिसने कुर्की का आदेश दिया था और या जिस न्यायलय क्षेत्र मे कुर्की की गई है वहां की जा सकती है।
4. कुर्क की गई सम्पति को निर्मुक्त, विक्रय या वापस करना:-
A. यदि वह घोषित व्यक्ति उद्घोषणा में दिए गए समय के अंदर हाजिर हो जाता है तो न्यायालय संपत्ति को कुर्की से निर्मुक्त करने का आदेश देगा।
B. यदि उद्घोषित व्यक्ति घोषणा के विनिर्दिष्ट समय के अंदर हाजिर नहीं होता है या कुर्की को छ माह का समय हो गया है या सम्पत्ति से सबंधित आपत्तियों का निपटारा कर दिया हो तो उन सम्पत्तियों का विक्रय भी किया जा सकता है। साथ ही अगर न्यायालय को लगता है की अमुक सम्पति का जल्दी विक्रय करना स्वामी के लिए फायदेमंद है तो जब भी ठीक समझें विक्रय किया जा सकता है।
C. कुर्की की तारीख से 2 वर्ष के अंदर कोई व्यक्ति जिसकी संपत्ति की कुर्की की गई थी वह न्यायालय के समक्ष हाजिर हो जाता है या उसे पकड़ कर लाया जाता है और वह न्यायालय के समक्ष साबित कर देता है कि वह वारंट के निष्पादन से बचने के लिए फरार नहीं हुआ था व किसी अन्य कारण से हुआ था और उसे किसी घोषणा की सूचना नहीं मिली थी और ऐसी स्थिति आ जाति है तो वह सम्पति जो विक्रय कर दी गई है या उसका कुछ भाग विक्रय किया गया है तो ऐसे विक्रय से हुई शुद्ध आय से खर्चों को काट कर बाकि उसे वापस प्रदान कर दिया जायेगा।
5. हाजरी के लिए बंध पत्र या जमानत पत्र लेने की शक्ति:- बीएनएसएस धारा 91 में बताया गया है कि जब कोई व्यक्ति जिसकी हाजिरी या गिरफ्तारी के लिए किसी न्यायालय द्वारा कोई समन या वारंट जारी किया गया है। तो न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह उस व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह व्यक्ति हाजिरी के लिए बंद पत्र या जमानत पत्र निष्पदित करें। इन्हें सामान्य भाषा में मुचलका बोला जाता है।
6. बंध पत्र व ज़मानत पत्र भंग होने पर गिरफ्तारी:- बीएनएसएस धारा 92 के अंतर्गत जब कोई व्यक्ति बंध पत्र या जमानत पत्र द्वारा न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए आबध है और हाजिर नहीं होता है, तो न्यायालय द्वारा व्यक्ति को गिरफ्तार कर पेश करने का आदेश दिया जा सकता है।