May 21, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 20 जुलाई 2022। देश में आम चुनाव अभी डेढ़ साल दूर है मगर भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने अभी से ही उसके लिए बिछात बिछानी आरम्भ कर दी है। उसे बड़ी चुनोती महाराष्ट्र में महाअगाडी गठबंधन से व यूपी जैसे बड़े राज्य में सपा गठबंधन से मिलनी है, ये भांपकर सबसे पहले इन्हीं दो गठबंधनों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की रणनीति बनाई गई, जिसमें भाजपा काफी हद तक सफल रही है और आम चुनाव की अपनी राह को काफी आसान किया है। विपक्षी चाहकर भी अपने कुनबे के कमजोर होने से रोक नहीं पा रहे।
पिछली बार महाराष्ट्र में शिव सेना को आम चुनाव में अच्छी सफलता मिली थी, उसको कांग्रेस और एनसीपी का साथ था। ये महाअगाडी गठबंधन इस बार बड़ी समस्या खड़ा करता। इसलिए पहले चरण में महाराष्ट्र सरकार को घेरे में लिया गया। उद्धव ठाकरे की शिव सेना में बगावत हुई और अधिकतर विधायकों को लेकर एकनाथ शिंदे उद्धव से अलग हो गये। सरकार बनाने के लिए भाजपा ने बी टीम बनकर भी सहयोग दिया। शिंदे की सरकार बनते ही उनके गुट को असली शिव सेना बताने और बनाने की कवायद शुरू हो गई। उद्धव ये रणनीति भांप गये। इसीलिए उन्होंने सांसदों की भावना के अनुरूप सहयोगी कांग्रेस और एनसीपी से अलग जाकर भाजपा के राष्ट्रपति उम्मीदवार मुर्मू को समर्थन का ऐलान किया। ये निर्णय केवल पार्टी पर वर्चस्व को लेकर किया गया।
मगर उसका भी असर नहीं हुआ और टूटे शिंदे गुट ने राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के अगले ही दिन शिव सेना संसदीय दल को भी विभाजित कर दिया। 12 सांसदों के साथ उन्होंने संसदीय दल का नेता बन उद्धव के गुट को मात दी। शिंदे ने अपने समर्थक राहुल शावले को नेता घोषित कर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर नेता के रूप में मान्यता दे दी। उद्धव ठाकरे के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा। ठीक इसी तरह कुछ समय पहले रामविलास पासवान की लोजपा का विभाजन हुआ और चिराग पासवान की जगह पशुपति पारस को नेता माना गया था क्योंकि ज्यादा सांसद उनके साथ थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले चरण में शिंदे के गुट को असली शिव सेना बनाने की कोशिश होगी ताकि आम चुनाव में उससे गठबंधन हो और भाजपा अपने राजनीतिक नुकसान को रोक ले।
यूपी चुनाव में सपा ने गठबंधन बना भाजपा को कड़ी चुनोती दी थी। भाजपा को उससे आम चुनाव में नुकसान का खतरा दिखने लगा। उसी नुकसान को रोकने के लिए सपा से शिवपाल यादव और ओम राजभर को अलग करने की रणनीति बनाई, जिसके सकारात्मक परिणाम दिखने शुरू हो गये। सर्वाधिक सीट वाले यूपी में आम चुनाव के परिणाम भाजपा के पक्ष में रहे, ये उसी की कवायद है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सपा गठबंधन के इस बिखराव से आम चुनाव में भाजपा को निश्चित रूप से फायदा होगा।
आम चुनाव की छांव में ही अब भाजपा और उसके सहयोगियों ने राजस्थान और उड़ीसा को साधने की कोशिश शुरू की है। उड़ीसा से राष्ट्रपति उम्मीदवार देकर नवीन पटनायक के किले में सेंध का प्रयास है तो धनकड़ को उप राष्ट्रपति उम्मीदवार बना राजस्थान के बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश की गई है। भाजपा और उसके सहयोगियों की रणनीति को विपक्षी दल भांप रहे हैं, मगर कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। इन घटनाओं के बाद आने वाले समय में देश व प्रदेशों के राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलाव दिखने तय है। जिसका असर अगले आम चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार